HIGH COURT OF RAJASTHAN (JAIPUR BENCH)
Chandra Prakash Shrimali, J
Radheshyam Sharma – Appellant
Versus
State Of Rajasthan – Respondent
S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 5706/2023 | S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 5707/2023
याचीगण/अभियुक्तगण राधेश्याम शर्मा व सीताराम शर्मा की ओर से पृथक-पृथक आपराधिक विविध याचिका संख्या क्रमशः 5706/2023 व 5707/2023 अंतर्गत धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 16/2022 पुलिस थाना चित्रकूट, जयपुर पश्चिम अंतर्गत धारा 406, 420, 467, 468, 471, 120बी भा.द.सं. में व उससे संबंधित कार्यवाही को अपास्त करने हेतु याचिका में अंकित आधारों पर प्रस्तुत की गयी है।
चूंकि उक्त दोनों याचिकाएं एक ही प्रथम सूचना रिपोर्ट से संबंधित हैं, ऐसे में उक्त दोनों याचिकाओं का निस्तारण एक साथ एक ही आदेश के माध्यम से किया जा रहा है।
याचीगण/अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का बहस के दौरान तर्क रहा है कि परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या 2 (आगे 'परिवादी' के नाम से संबोधित किया जाएगा) वरुण फिडोडा ने याचीगण/अभियुक्तगण के विरुद्ध एक परिवाद अंतर्गत धारा 420, 406, 467, 468, 120बी भा.द.सं. में प्रस्तुत किया था, जिस पर पुलिस थाना चित्रकूट, जयपुर द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 16/2022 दर्ज की गयी थी। उक्त परिवाद में परिवादी ने याचीगण/अभियुक्तगण पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने दिनांक 23.10.2018 को परिवादी से 80 लाख रुपये उधार प्राप्त कर नागेश्वर डवलपर्स प्रा. लि. की एक आवासीय योजना में स्वयं के नाम व स्वामित्व का भूखण्ड संख्या जीएच-1ए योजना श्रीराम सिटी ग्राम खातीपुरा, तहसील सांगानेर, जिला जयपुर स्थित कुल 5022 वर्गगज भूमि का उक्त भूखण्ड उधार राशि के एवज में गिरवी रखकर एक इकरारनामा लिखकर दिया था। उक्त राशि अदा करने में असमर्थ होने पर याचीगण/अभियुक्तगण ने उक्त भूखण्ड को परिवादी को बेचने का निवेदन किया। जिस पर उक्त भूखण्ड का एक सौदा एक करोड़ रुपये में तय हुआ और परिवादी द्वारा 80 लाख रुपये उधार राशि के अलावा 20 लाख रुपये याची/अभियुक्त राधेश्याम शर्मा को अदा किये, जिसका इकरारनामा दिनांक 12.11.2020 निष्पादित हुआ। इस संबंध में
दोनों पक्षों में विवाद होने पर परिवादी की ओर से उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवायी गयी। उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट में अंकित समस्त राशि परिवादी द्वारा प्राप्त की जा चुकी है तथा दोनों पक्षों में समझौता दिनांक 02.04.2026 को निष्पादित हो चुका है। परिवादी ने याचीगण/अभियुक्तगण से 15-15 लाख रुपये कुल 30 लाख रुपये के दो डी.डी. 014240 व 014243 एक्सिस बैंक लिमिटेड के प्राप्त कर लिये हैं। वर्तमान प्रकरण सिविल प्रकृति का मामला है और जमीन-जायदाद की खरीद-फरोख्त से संबंधित मामला है और राजीनामा होने के आधार पर याचीगण/अभियुक्तगण के विरुद्ध दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट व उससे संबंधित समस्त कार्यवाही को अपास्त एवं निरस्त किया जावे।
परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या 2 के विद्वान अधिवक्ता का बहस के दौरान तर्क रहा है कि याचीगण/अभियुक्तगण से परिवादी का राजीनामा हो चुका है और दिनांक 02.04.2026 को जो समझौता पत्र निष्पादित हुआ था, उसे रिकॉर्ड पर लिये जाने के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। परिवादी ने याचीगण/अभियुक्तगण से 15-15 लाख रुपये के दो डी.डी. प्राप्त कर लिए हैं और अब कोई राशि बकाया नहीं है। दोनों पक्षों के मध्य जमीन-जायदाद की खरीद-फरोख्त से संबंधित मामला था। अतः परिवादी की ओर से प्रस्तुत प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 16/2022 पुलिस थाना चित्रकूट व उससे संबंधित अन्य समस्त कार्यवाही को अपास्त कर दिया जावे, तो उसे कोई आपत्ति नहीं है।
विद्वान लोक अभियोजक ने उचित आदेश पारित किये जाने का निवेदन किया।
मैंने उभयपक्षों के तर्कों पर मनन किया तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
न्यायालय के समक्ष परिवादी/प्रत्यर्थी संख्या 2 वरुण फिडोडा उपस्थित है। उसके और याचीगण/अभियुक्तगण के मध्य दिनांक 02.04.2026 को दोनों पक्षों के मध्य हुआ राजीनामा प्रस्तुत किया गया, जो अभिलेख पर रखा जावे। परिवादी ने याचीगण/अभियुक्तगण से 15-15 लाख रुपये कुल 30 लाख रुपये के दो डी.डी. एक्सिस बैंक के प्राप्त किया जाना जाहिर किया तथा अन्य कोई राशि शेष नहीं होना बताया है। परिवादी तथा उसके अधिवक्ता ने संयुक्त रूप से यह कथन किया है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 16/2022 पुलिस थाना चित्रकूट व उससे संबंधित समस्त कार्यवाही को निरस्त अर्थात अपास्त किया जाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय विनिश्चय Gian Singh v. State of Punjab ; (2012) 10 SCC 303 के पैरा संख्या 61 को यहां उद्धरित किया जाना न्यायोचित होगा:-
"61. The position that emerges from the above discussion can be summarised thus : the power of the High Court in quashing a criminal proceeding or FIR or complaint in exercise of its inherent jurisdiction is distinct and different from the power given to a criminal court for compounding t
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