HIGH COURT OF RAJASTHAN (JODHPUR BENCH)
Farjand Ali, J
State of Rajasthan – Appellant
Versus
Jagar Singh – Respondent
S.B. Criminal Appeal No. 145/1998
Order
21/04/2026
01. राज्य सरकार की ओर यह दाण्डिक अपील विद्वान विशिष्ट न्यायाधीश, स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम प्रकरण, भीलवाड़ा (राजस्थान) द्वारा पारित निर्णय दिनांक 26.07.1997 के विरुद्ध प्रस्तुत की गई, जिसके द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा प्रत्यर्थी/आरोपी को दोषमुक्त किया गया।
02. संक्षेप में प्रकरण के तथ्य इस प्रकार हैं कि दिनांक 02.08.1994 को एस.एच.ओ. सुरेन्द्र सिंह द्वारा वृत्ताधिकारी आजाद कुमार शर्मा को रात्रि को जरिये टेलिफोन सूचित किया कि मुखबिर की सूचना के अनुसार एक आदमी बस स्टैण्ड पर घूम रहा है, जिसके पास अफीम है। प्रकरण के तथ्यों के अनुसार, जैसा कि आरोप पत्र में बताया गया है कि वृत्ताधिकारी एवं उनकी टीम ने रोडवेज बस स्टैण्ड के मुख्य गेट से एक व्यक्ति को दस्तयाब किया, जिसके दाहिने हाथ में एक पोटली थी, जिसकी तलाशी करने पर उसके पास एक किलो अफीम की बरामदगी हुई। परीक्षण के सैंपल लिए जाने एवं अभियुक्त को गिरफ्तार किये जाने सहित अन्य सामान्य एवं औपचारिक अनुसंधानात्मक कार्यवाहियों के उपरांत प्रत्यर्थी के विरुद्ध धारा 8/18 स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया है। बाद प्रसंज्ञान अभियुक्त के विरुद्ध उपरोक्त आरोप पत्र विरचित किए गए, जिससे अभियुक्त ने इनकार कर अन्वीक्षा चाही।
03. अभियोजन की ओर से आरोप के प्रमाणीकरण के क्रम में 12 अभियोजन साक्षीण को प्रस्तुत किया तथा कुछ दस्तावेजात का अवलंब लिया। अभियुक्त को धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत परीक्षित किया, जिसने उसने गवाहों के कथनों को गलत बताया, तत्पश्चात् उभय पक्षों की बहस सुनी गई एवं आक्षेपित निर्णय के द्वारा अभियुक्त/प्रत्यर्थी को दोषमुक्त घोषित किया गया, अतः यह अपील प्रस्तुत हुई है।
राज्य सरकार की ओर से विद्वान लोक अभियोजक श्री एन. एस. चाण्डावत की बहस सुनी। प्रत्यर्थी की ओर से कोई उपस्थित नहीं है। अतः इस न्यायालय में उपस्थित वैष्णव निकिता, अधिवक्ता से अनुरोध किया गया कि वे इस मामले में अभियुक्त की पैरवी करे तथा न्यायालय को सहयोग प्रदान करें, जिसकी उन्होंने सहर्ष सहमति दी तथा न्यायालय को सहयोग प्रदान किया।
04. अधीनस्थ न्यायालय की पत्रावली का अवलोकन किया गया एवं आक्षेपित निर्णय का परिशीलन किया गया। अध्युपरांत इस न्यायालय का यह मत है कि निश्चित रूप से विद्वान न्यायाधीश, विचारण न्यायालय ने साक्ष्य का सूक्ष्मतापूर्वक परीक्षण एवं विवेचन किया है तथा साक्ष्य के दोहन के पश्चात् ही यह निष्कर्षित किया गया है कि अभियोजन आरोप के प्रमाणीकरण के अपने दायित्व को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस मामले में अभियोजन का यह दायित्व था कि वो युक्तियुक्त संदेह से परे यह प्रमाणित करें कि विहित दिनांक को अभियुक्त/प्रत्यर्थी के चैतन्य एवं एकांतिक आधिपत्य से एक सामग्री बरामद की गई थी, जो सामग्री निषिद्ध पदार्थ की श्रेणी में आती है। चूंकि स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम में सजा के प्रावधान काफी गंभीर है, इसलिए विधायिका ने उद्देश्यपूर्वक नागरिकों के हितों और उनकी स्वतंत्रता के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए प्रावधान बनाए है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा समय-समय पर प्रतिपादित विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों के माध्यम से धारा 42 एवं धारा 50 के प्रावधान को आज्ञापक बताया गया है एवं यह स्पष्ट किया गया है कि जिन मामलों में धारा 42 एवं धारा 50 स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम की पालना अक्षरश: नहीं की जाती है, वहां पर बरामदगी की कार्यवाही दुषित हो जाती है।
05. इस प्रकार आक्षेपित निर्णय का सूक्ष्मतापूर्वक मूल्यांकन करने तथा अभिलेख का अवलोकन करने से इस न्यायालय का यह निश्चित मत है कि विद्वान अधीनस्थ न्यायालय ने साक्ष्य के विवेचन के उपरांत दोषमुक्ति का जो निर्णय दिया है, वह विधिनुसार उचित एवं प्रकरण पर उपलब्ध तथ्यों के आलोक में न्यायपूर्ण है। ऐसे मामले में अपीलीय न्यायालय को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। आपराधिक न्यायिक शास्त्र के नियमों के अनुसार जहां अभिलेख पर दो प्रकार की स्थितियां प्रकट हो, जिसमें एक स्थिति अभियोजन का समर्थन करती हो तथा दूसरी बचाव/प्रतिरक्षा पक्ष को तब भी जो दृष्टिकोण अभियुक्त के समर्थन का है, उसको स्वीकार करना चाहिए।
06. यह विधिक स्थिति सुस्थापित है कि अभियुक्त के पक्ष में निर्दोषिता की अवधारणा होती है, जो अवधारणा सक्षम अधिकारिता के न्यायालय द्वारा दोषमुक्त के निर्णय के उपरांत अधिक बलवती हो जाती है। ऐसे मामले में अपीलीय न्यायालय को हस्तक्षेप तब तक नहीं करना चाहिए, जब तक कि यह संतुष्टि नहीं हो जाये कि विचारण न्यायालय का निर्णय पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य को नजरअंदाज करते हुए पारित किया गया था अथवा यह विधि के प्रा
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