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2026 Supreme(Online)(Raj) 15088

HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN

BENCH AT JAIPUR


S.B. Civil First Appeal No. 86/2012


State Through Chief Secretary And Another

----Appellants

Versus

Brig Maharaja Sawai Bhawani Singh And Other

----Respondents


For Appellant(s) : Mr. Vigyan Shah, AAG assisted by

Mr. Sankalp Vijay, AAAG and

Mr. Deepak Mittal

For Respondent(s) : Mr. Ramesh Chand Sharma with

Ms. Perishaa Singh Sisodiya for

respondent Nos. 1/1 and 1/2

Mr. Jaideep Singh with

Ms. Jigyasa Patyal and

Mr. Tushar Singh for respondent

No. 1/3


HON'BLE MR. JUSTICE CHANDRA PRAKASH SHRIMALI


Order

1. Arguments Concluded On: 04/05/2026
2. Judgment Reserved On: 04/05/2026
3. Full Judgment/Operative Part Pronounced: Full Judgment
4. Pronounced On: 12.05.2026

S.B. Civil Misc. Application No. 8949/2016:-

उभयपक्षों को प्रार्थना पत्र संख्या 8949/2016 अंतर्गत आदेश 1 नियम 8ए सपठित धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता पर सुना गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।

इस आदेश के द्वारा एकलपीठ सिविल प्रथम अपील संख्या 86/2012 में डॉ. यदुनाथ दशनन द्वारा प्रस्तुत उक्त प्रार्थना पत्र अंतर्गत आदेश 1 नियम 8ए सपठित धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता का निस्तारण किया जा रहा है।

प्रार्थी डॉ. यदुनाथ दशनन के विद्वान अधिवक्ता का बहस के दौरान यह तर्क रहा है कि प्रार्थी लोक आध्यात्मिक व्यक्ति है तथा वह जयपुर का निवासी है। लोकहित में कई जन हित याचिका जयपुर की लोकसंपत्ति की सुरक्षा हेतु उसके द्वारा प्रस्तुत की गई है। उसे राजस्थान पत्रिका दिनांक 19.01.2016 के समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार से ज्ञात हुआ कि भारत सरकार व जयपुर के पूर्व शासक महाराजा सवाई मान सिंह के मध्य राजमहल पैलेस की अचल संपत्ति के संबंध में Covenant हुआ था। विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष राज्य सरकार ने वादीगण से मिलीभगत कर न्यायसम्मत पैरवी नहीं की, जिसके कारण पूर्व शासक के परिवार को उक्त विवादित संपत्ति का मालिक घोषित कर दिया गया। विद्वान विचारण न्यायालय के निर्णय व डिक्री दिनांक 24.11.2011 व पक्षकारन के अभिवचनों के आधार पर इस प्रकरण में दो महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 363 के प्रावधानों के अंतर्गत अधीनस्थ विचारण न्यायालय को उक्त वाद की सुनवाई करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त था या नहीं तथा क्या भारत संघ का इस प्रकरण में आवश्यक एवं उचित पक्षकार होना जरूरी था। जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा ऐसे कई विधिक प्रश्नों को विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष नहीं उठाया गया।

राजमहल पैलेस पूर्व में 'मंजी का बाग' और 'रेजिडेंसी' के नाम से जाना जाता था, जिसका उल्लेख Covenant में नहीं था लेकिन फिर भी उस संपत्ति को 'प्रिंसेस हाउस' बताकर प्रत्यर्थीगण/वादीगण ने हड़पने का प्रयास किया, जबकि राजमहल पैलेस कभी भी 'प्रिंसेस हाउस' के नाम से नहीं रहा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 363 के अंतर्गत भारत सरकार व महाराजा सवाई मानसिंह के मध्य दिनांक 18.03.1949 को जो Covenant हुआ था, उसकी सुनवाई का क्षेत्राधिकार किसी भी न्यायालय को नहीं है। फिर भी विद्वान विचारण न्यायालय के इस तथ्य पर विचार नहीं किया गया है। आदेश 1 नियम 8ए सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत न्यायालय न्याय के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी भी व्यक्ति को सुनवाई का अवसर प्रदान कर सकता है। यदि प्रार्थी को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाता है तो इससे किसी भी पक्ष के हितों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। अतः प्रार्थी का प्रार्थना पत्र स्वीकार किया जाकर प्रार्थी को इस अपील की प्रक्रिया में भाग लेने और उपरोक्त विधिक प्रश्नों के संबंध में अपना विनम्र मत व्यक्त करने की अनुमति प्रदान की जावे।

प्रार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्कों के समर्थन में Gandhi Grah Nirman Sahkari Samiti Ltd. etc. Vs. State of Rajasthan and others, AIR 1994 SUPREME COURT 2329. विनिश्चय प्रस्तुत किया है।

पक्षकारन के विद्वान अधिवक्ता का बहस के दौरान यह तर्क रहा है कि प्रार्थी विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष पक्षकार नहीं था न ही इस प्रथम अपील में पक्षकार है। आदेश 1 नियम 8ए सिविल प्रक्रिया संहिता का प्रावधान वाद में लागू होता है, अपील में नहीं। ऐसी स्थिति में अपील के स्तर पर प्रार्थी को सुनवाई का अवसर प्रदान करने का कोई न्यायसंगत उचित आधार नहीं है। प्रार्थी ने प्रत्यर्थीगण/वादीगण पर दबाव बनाने व उन्हें ब्लैकमेल करने के उद्देश्य से बिना किसी न्यायसंगत उचित आधार के यह प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया है। अपील में राज्य सरकार द्वारा अपना पक्ष रखा जा रहा है। विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष भी राज्य सरकार के एक वर्ग जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा अपना पक्ष रखा गया है। उक्त विधिक प्रश्नों को अपीलार्थीगण/प्रतिवादीगण द्वारा बहस के दौरान ही उठाया जा सकता है। प्रार्थी को सुनवाई का अवसर दिए जाने का कोई न्यायसंगत उचित आधार नहीं है। अतः प्रार्थी के प्रार्थना पत्र को अस्वीकार कर खारिज किया जाए तथा माननीय उच्चतम न्यायालय ने जयपुर विकास प्राधिकरण व अन्य बनाम सवाई भवानीसिंह और अन्य, सिविल अपील संख्या 208/2026 में पारित आदेश दिनांक 09.01.2026 के द्वारा अपील को चार सप्ताह में निस्तारित करने का आदेश दिया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार प्रकरण का शीघ्र निस्तारण किया जाना है,

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