2026 Supreme(Online)(Raj) 18977
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
[2026:RJ-JP:19683]
S.B. Civil Miscellaneous Appeal No. 1125/2025
Abhishek Son of Shri Birdichand, Age 19 years, Resident of Ward
No.23, Rao Dheersingh Colony, Shahpura, District Jaipur
(Rajasthan).
----Appellant/Claimant
Versus
1. Ramkaran Son of Hanuman Sahay, Resident of Dhani
Mukta Wali, Tan Bhabru, Police Station Shahpura, District
Jaipur (Rajasthan). (Driver Motorcycle No. RJ-02-TS-3336)
2. Veersingh Son of Bhoolsingh, Resident of Khundroth,
Police Station Mandan, Tehsil Behror, District Alwar
(Rajasthan). (Registered Owner Motorcycle No. RJ-02-TS-3336).
3. National Insurance Company Limited through Regional
Manager, Office Jeevan Jyoti Building, Near Ambedkar
Circle, Jaipur (Rajasthan). (Insurance Company
Motorcycle No. RJ-02-TS-3336)
(Fresh Address- NBBC Center Opposite Hindustan
Petroleum, Jyoti Nagar, Sardar Patel Near Bais Godam,
Jaipur (Rajasthan).
----Respondents/Non-Claimants
For Appellant(s) : Mr. Ram Sharan Sharma, Adv.
For Respondent(s) : Mr. Rajeev Bhushan Bansal, Adv.
(For Insurance Company)
HON'BLE MR. JUSTICE ASHUTOSH KUMAR
Judgment
08/05/2026
1. अपीलार्थी अभिषेक की ओर से प्रस्तुत यह अपील धारा 173 मोटर वाहन अधिनियम-1988 के तहत न्यायालय मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश) क्रम संख्या-02, शाहपुरा, जिला जयपुर, राज0 (जिसे आगे 'विद्वान अधिकरण' के नाम से संबोधित किया जाएगा) द्वारा क्लेम याचिका संख्या-127/2022, अभिषेक बनाम रामकरण व अन्य में पारित निर्णय दिनांक 27.01.2025 (जिसे आगे 'आक्षेपित निर्णय' के नाम से संबोधित किया जाएगा) के विरुद्ध प्रस्तुत की गई है।
2. अपीलार्थी अभिषेक की ओर से जरिये प्राकृतिक संरक्षक पिता बिरदीचन्द द्वारा विद्वान अधिकरण के समक्ष, मोटर वाहन दुर्घटना में उसके पुत्र अभिषेक के आहत हो जाने के फलस्वरूप कुल 41,60,000/- रुपये क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त करने हेतु क्लेम याचिका प्रस्तुत की गयी थी। विद्वान अधिकरण द्वारा उक्त क्लेम याचिका का निस्तारण करते हुए अपीलार्थी को कुल 3,34,100/- रुपये की क्षतिपूर्ति राशि मय ब्याज 06 प्रतिशत सालाना की दर से दिलवाई गयी है। विद्वान अधिकरण के उक्त आक्षेपित निर्णय से व्यथित होकर हस्तगत अपील, अपीलार्थी की ओर से क्षतिपूर्ति राशि में बढ़ोतरी किये जाने हेतु प्रस्तुत की गयी है।
3. दौरान बहस विद्वान अधिवक्ता अपीलार्थी का तर्क रहा है विद्वान अधिकरण द्वारा अपीलार्थी की कोई आय निर्धारित नहीं कर, आय की क्षति के मद में 22 प्रतिशत स्थायी निर्योग्यता होने के आधार पर एकमुश्त 3,00,000/- रुपये की राशि अपीलार्थी को दिलवाकर त्रुटि कारित की गयी है, जबकि वक्त घटना अपीलार्थी पढ़ाई के साथ पशुपालन का कार्य कर 10,000/- रुपये मासिक आय अर्जित करता था। विद्वान अधिवक्ता अपीलार्थी का यह भी तर्क रहा है कि मामले की दुर्घटना में अपीलार्थी के सिर, दाहिनी आंख व जबड़े पर गंभीर चोटें कारित हुई, जिसके फलस्वरूप अपीलार्थी के शरीर पर कुल 22 प्रतिशत स्थायी निर्योग्यता आना पाया गया है। विद्वान अधिवक्ता अपीलार्थी का यह भी तर्क रहा है कि विद्वान अधिकरण द्वारा अपीलार्थी को भविष्य में होने वाली सुख-सुविधाओं की कमी के मद में तथा शारीरिक व मानसिक पीड़ा की मद में कोई राशि नहीं दिलवाई गई है व अन्य मदों में अत्यधिक कम राशि दिलवाई गयी है, जिनमें बढ़ोतरी की जावे। अतः अपीलार्थी की ओर से प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाकर क्षतिपूर्ति राशि में बढ़ोतरी किये जाने की प्रार्थना की गयी।
4. इसके विपरीत विद्वान अधिवक्ता प्रत्यर्थी बीमा कम्पनी की ओर से उपरोक्त तर्कों का विरोध करते हुए विद्वान अधिकरण के निर्णय की पुष्टि किये जाने तथा अपीलार्थी की ओर से संस्थित की गयी अपील को खारिज किये जाने की प्रार्थना की गयी। उनका यह भी तर्क रहा है कि स्थायी निर्योग्यता प्रमाण पत्र घटना के लगभग चार साल बाद बनवाया गया है। अतः इसे न माना जावे।
5. दोनों पक्षों की बहस सुनी गयी। पत्रावली का अवलोकन किया गया।
6. मामले की दुर्घटना में अपीलार्थी को कारित हुई साधारण व गंभीर चोटों के फलस्वरूप अपीलार्थी के शरीर पर कुल 22 प्रतिशत स्थायी निर्योग्यता आना पाया गया है, जैसा कि स्थायी निर्योग्यता प्रमाण पत्र प्रदर्श-16 के अवलोकन से स्पष्ट है। मोटर दुर्घटना में आहत व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति दिलवाये जाने के संदर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने न्यायिक दृष्टांत Anant Son of Sidheswar Dukre Vs. Pratap Son of Zhampannappa Lamzane & Anr. reported in (2018) 9 Supreme Court Cases 450, में सिद्धान्त प्रतिपादित किया है जो निम्न प्रकार से है :-
“12. In case of motor accidents leading to injuries and disablements, it is a well settled principle that a person must not only be compensated for his physical injury, but also for the non-pecuniary losses which he has suffered due to the injury. The claimant is entitled to be compensated for his inability to lead a full life, and enjoy those things and amenities which he would have enjoyed, but for the injuries.
13. The purpose of compensation under the Motor Vehicles Act is to fully and adequately restore the aggrieved to the position prior to the accident. This Court in Yadava Kumar v. National Insurance Co. Ltd. explained “just compensation” in the following words:
15. It goes without saying that in matters of determination of compensation both the tribunal and the court are statutorily charged with a responsibility of fixing a “just compensation”. It is obviously true that determination of a just compensation cannot be equated to a bonanza. At the same time the concept of “just compensation” obviously suggests application of fair and equitable