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2023 Supreme(Online)(SC) 18470

प्रतिवेद्य

भारीय सवच्च न्यायालय

सिसविवल अपीलीय अतिकारिरा

सिसविवल अपील सं. ................वर्ष 2023

(@ विव.अ.या. (सी) संख्या 28377 वर्ष 2018)

गणेश प्रसाद

.... अपीलका (गण)

बनाम

राजेश्वर प्रसाद एवं अन्य

...प्रतिवादी (गण)

विनणय

न्यायमूर्ति जे

. बी . पारदीवाला

1.

अनुमति प्रदान की गई।

2.

सुविवा के लिलए, इस वाद के अपीलार्थी; को 'मूल प्रतिवादी या प्रतिवादी' के

रूप में संदर्भिभ विकया जाएगा और प्रत्यर्थी;गण को 'मूल वादी या वादी' के रूप में

संदर्भिभ विकया जाएगा।

3.

यह अपील, वाद संख्या 154 वर्ष 2009 के मूल प्रतिवादी की ओर से,

जो वादी गण द्वारा सिसविवल जज (जे.डी.), पूव;, सिजला बलिलया की अदाल में

बंक के उन्मोचन उपरां वाद संपलिL के कब्जे के लिलए संस्थिOर्थी विकया गया र्थीा,

विवविव प्रकीण रिरट यातिचका 1346 वर्ष 2015 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा

पारिर 04.07.2018 विदनांविक आदेश के विवरुद्ध की गई है सिजसमें, अपर सिजला

जज द्वारा पारिर 25.02.2015 विदनांविक आदेश की अभिभपुविW की गई र्थीी सिजसके

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

द्वारा वादी गण को सिसविवल प्रविfया संविहा, 1908 (संक्षेप में सिस.प्र.सं.) के आदेश

VI विनयम 17 के प्रावानों के ह वाद पत्र को संशोति करने की अनुमति दी

गई र्थीी।

थ्यात्मक आार

4.

सिसविवल वाद की विवर्षयवOु ब्लॉक संख्या 2-5, ए संख्या 25, 26, 27,

28, 29 चौक, बलिलया सिसटी, परगना व सिजला बलिलया में स्थिOर्थी दुकान है। वादी

वाद संपलिL के वै मालिलक होने का दावा करे हैं। प्रतिवादी का पक्ष यह है विक

वादीगण के विपा ने ऊपर वर्भिण वाद संपलिL के 1/3 विहOसे के संबं में प्रतिवादी

के विपा के पक्ष में एक बंक विवलेख विनष्पाविद विकया र्थीा और दुकान का कब्जा

विदया र्थीा। इस प्रकार, प्रतिवादी के अनुसार, वादीगण का विपा बन्कका र्थीे और

उसका विपा बन्कग्रहीा र्थीा। उक्त पंजीकृ बंक विवलेख 12.02.1957 को

विनष्पाविद होना अभिभकभिर्थी है।

5.

1957 से 2005 क, बन्कग्रहीा के पास वाद संपलिL का कब्जा रहा

क्योंविक न ो बन्क न का भुगान विकया गया और न ही बंक को छु ड़ाया गया

र्थीा और 30 साल की समयावति के बाद, बंक संपलिL में बन्कका का

अतिकार परिरसीमन अतिविनयम, 1963 (संक्षेप में, 'अतिविनयम, 1963') की

अनुसूची के अनुच्छेद 61 ए के अीन समाप्त हो गया र्थीा। वर्ष 2005 में प्रतिवादी

के विपा यानी बन्कग्रहीा, अर्थीा् श्री गुलाब चंद की मृत्यु हो गई।

6.

15.03.2007 को, वादी ने वमान मामले के अपीलार्थी; प्रतिवादी एवं चार

अन्य के विवरुद्ध लघु वाद न्यायाीश (वरिरष्ठ प्रभाग) के न्यायालय में इस घोर्षणा

के लिलए वाद सं. 3 वर्ष 2007 संस्थिOर्थी विकया विक वादी वाद संपलिL अर्थीा दुकान

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

के वै Oवामी हैं और उसे वमान मामले के अपीलार्थी; प्रतिवादी के विपा को

विकराए पर विदया गया र्थीा और प्रतिवादी के विपा के विनन के बाद, उन्होंने वादी

को विकराए का भुगान बंद कर विदया और अवै रूप से प्रतिवादी संख्या 2 से 5

को संबंति दुकान में उप-विकराएदार के रूप में शाविमल कर लिलया। इस प्रकार,

वादीगण ने दुकान के कब्जे की तिडfी के लिलए प्रार्थीना की।

7. वादीगण द्वारा संस्थिOर्थी लघु वाद सं. 3 वर्ष 2007 में विनम्नलिललिख अनुोर्ष के

लिलए प्रार्थीना की गई र्थीी:

"क. वादीगण के पक्ष में , प्रतिवादीगण के विवरद्ध उक्त दुकान यर्थीा

उसि~लिख परिरसर से बेदखली का आदेश, जैसा विक प्रतिवादी के लिखलाफ

वादी के पक्ष में सीमा के नीचे विवOार से विदया गया है , पारिर विकया

जाए, और यविद वे न्यायालय द्वारा आदेभिश अवति के भीर खाली नहीं

करे हैं ो इसे न्यायालय के माध्यम से खाली कराया जाए और इसका

कब्जा हम वादीगण को विदया जाए।

ख. प्रतिवादीगण के विवरुद्ध और वादीगण के पक्ष में 4500/- रुपये के

भुगान के लिलए तिडfी पारिर की जाए जैसा विक नीचे विवOार से विदया

गया है।

ग. यह विक 500/- रुपये की हजाना तिडfी मुकदमे के लंविब रहने के

दौरान प्रतिवाविदयों के लिखलाफ और वादी के पक्ष में पारिर की जाए।

घ. मुकदमे की लाग को प्रतिवादीगण द्वारा हम वादीगण को भुगान

करने के लिलए विनद•भिश विकया जाए। इन अनुोर्षों के अलावा यविद

वादीगण न्यायालय की राय में विकसी अन्य अनुोर्ष के हकदार हैं, जो

प्रतिवाविदयों के लिखलाफ वादीगण के पक्ष में कम हो सकी है।"

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

8. पूवक्त वाद संख्या 3 वर्ष 2007 में, अपीलका प्रतिवादी ने अपना लिललिख

बयान दालिखल विकया और वादी के पूरे पक्ष से इनकार विकया और आगे कहा विक

वादी के विपा ने वाद संपलिL के संबं में विदनांक 12.02.1957 को एक बंक

विवलेख विनष्पाविद विकया र्थीा। और इस रह प्रतिवादी के विपा को वाद संपलिL का

कब्जा विमला। न ो वादी के विपा और न ही उसके कानूनी उLरातिकारिरयों ने

विकसी समय बंक को छु ड़ाया।

9. लघु वाद वाद सं. 3 वर्ष 2007 के वाद में अभिभवचविन वाद हेुक इस प्रकार

है:-

"यह विक वाद हेुक विदनांक 13-11-2006 को ब उत्पन्न हुआ जब

पंजीकृ नोविटस भेजा गया र्थीा और विदनांक 15-11-2006 को जब

नोविटस विदया गया र्थीा और विदनांक 31-12-2006 को जब नोविटस के

बावजूद दुकान खाली नहीं की गई र्थीी और न ही बकाया विकराए का

भुगान विकया गया र्थीा और यह न्यायालय के अतिकार क्षेत्र में आा है।"

10. अभिभलेख पर मौजूद सामग्री से यह प्री होा है विक ऊपर संदर्भिभ लघुवाद

वाद संख्या 3/2007 विदनांक 20.10.2010 के आदेश द्वारा गैर-अभिभयोजन के

लिलए खारिरज कर विदया गया र्थीा। लघुवाद वाद संख्या 3/2007 को खारिरज करने

का आदेश इस प्रकार है: -

“20-10-10- पुकारा गया। अभिभलेख प्रOु विकया। परिरवादी

अनुपस्थिOर्थी। अवसर के लिलए कोई आवेदन नहीं विदया गया है। वादी की

अनुपस्थिOर्थीति में वाद खारिरज विकया जाा है।"

11. लघुवाद वाद संख्या 3/2007 पूवक्त खारिरज होने के बाद, वादी ने संपलिL

का अंरण अतिविनयम, 1882 (संक्षेप में, 'टीपी अतिविनयम') की ारा 83 के

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

ह सिसविवल जज (जेडी) पूव;, सिजला बलिलया की अदाल में एक और मुकदमा

(यानी वमान मुकदमा) दायर विकया। सिजसे वाद सं. 154/2009 के रूप में

अंविक विकया गया।

12. उक्त वाद संख्या 154/2009 में, वादी द्वारा अभिभवचविन वाद कारण इस

प्रकार है:

"यह विक विदनांक 03-09-2008 को बन्क विवलेख की जानकारी होने

पर र्थीा विदनांक 31/03/09 को बन्क विवलेख की राभिश लेने से मना

करने पर वाद हेुक उत्पन्न हुआ र्थीा नगर बलिलया, परगना एवं सिजला

बलिलया के अन्ग आा है।"

13. वाद संख्या 154/2009 (2009 को पढ़ें) विनम्नानुसार है:-

"क. न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को बंक विवलेख राभिश 700/- रुपये

अन्य व्यय 5100/- रुपये कु ल 58,00/- रुपये विनारिर अवति के

भीर लेने और हम वादीगण को नीचे विदए गए कमरे का कब्जा देने के

लिलए नोविटस विदया जाए।

ख. प्रतिवादी के लिखलाफ वादी को मुकदमे की लाग दी जाए।

ग. इसके अलावा कोई भी वैकस्थि„पक राह या अन्य राह, सिजसके लिलए

वादी न्यायालय की राय में हकदार हैं, को भी वादी के पक्ष में और

प्रतिवादी के लिखलाफ दी जाए।

14. वाद संख्या 154/2009 में, प्रतिवादी ने अन्य बाों के सार्थी-सार्थी अपना

लिल…ख बयान इस प्रकार दज विकया:

"4. यह विक वाद पत्र का पैरा-4 असत्य एवं विनराार है। वादी के विपा

ने Oवयं प्रतिवादी के विपा के पक्ष में पंजीकृ बंक विवलेख विदनांक 12-

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

02-57 विनष्पाविद विकया र्थीा। ऐसे मामलों में उन्हें पंजीकृ बंक

विवलेख के बारे में जानकारी देने की कोई आवश्यका नहीं र्थीी। प्रतिवादी

के विपा या दादा कभी भी वादी के विपा या दादा के विकराएदार नहीं र्थीे।

वादीगण को Oवयं इस थ्य की पूरी जानकारी र्थीी विक वादी के विपा ने

प्रतिवादी के विपा के पक्ष में विदनांक 12-02-57 को बंक विवलेख

विनष्पाविद विकया र्थीा। प्रतिवादी के विपा या प्रतिवादी द्वारा वादी को कोई

विकराया नहीं विदया गया।

xxx

xxx

xxx

6. यह विक वादपत्र का पैरा -6 अOपW और अविनतिˆ है। वादी ने

जानबूझकर मामले का विववरण नहीं विदया है। यह सत्य है विक मैं प्रतिवादी

ने सत्य थ्यों के अनुसार मेरा सत्य लिललिख कर्थीन लघुवाद वाद संख्या

3/2007 में वादीगण द्वारा दायर लघुवाद सिसविवल न्यायाीश (एस.डी.)

बलिलया के न्यायालय में दायर विकया। यह मामला विदनांक 20.10.2010

को खारिरज कर विदया गया र्थीा।

7. यह विक वादपत्र का पैरा -7 झूठा और विनराार है, Oवीकार नहीं

विकया गया। बंक विवलेख के बारे में वादीगण को शुरू से ही जानकारी

र्थीी। वादीगण के विपा द्वारा बंक न कभी वापस नहीं विकया गया र्थीा।

मूल बंक विवलेख आज क मैं प्रतिवादी की विहरास में है।

मैं प्रतिवादी या मेरे विपा कभी भी वादी या उनके विपा का विकरायेदार

नहीं रहा हूं।

xxx

xxx

xxx

अतिरिरक्त कर्थीन

xxx

xxx

xxx

2. यह विक जैसा विक ऊपर उ~ेख विकया गया है थ्य यह है विक वादी के

विपा ने विदनांक 12.05.57 को पंजीकृ कब्जादायी बंक विवलेख को

विनष्पाविद विकया र्थीा, सिजसके मोचन के लिलए समय सीमा 30 वर्ष 12-

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

02-87 क र्थीी। वादी के विपा आदन वादी र्थीे। उन्होंने Oवेच्छा से

समय सीमा के भीर बंक को नहीं छु ड़ाया। वादी के विपा की मृत्यु भी

इस समयावति के समाप्त होने के 6 वर्ष बाद हुई। इस प्रकार प्रतिवादी के

विपा प्रतिकू ल कब्जे के आार पर नीचे उसि~लिख कमरे के मालिलक और

कब्जाारी हो गए। वाद परिरसीमा द्वारा वर्जिज है।

xxx

xxx

xxx

4. यह विक वादी का वाद कानूनी रूप से पोर्षणीय नहीं है।

5. यह विक वाद विववाद और सहमति से वर्जिज है।

6. यह विक वादीगण ने लघुवाद वाद संख्या 3/2007 राजेश्वर आविद

बनाम डॉ. गणेश प्रसाद आविद दायर विकया जो विदनांक 20-10-2010

को खारिरज कर विदया गया। इस प्रकार यह वाद अंः वादी के विवरुद्ध

और मुझ प्रतिवादी के पक्ष में विनण; हुआ। वमान वाद को इस आार

पर भी रेस-जुडीकाटा द्वारा वर्जिज विकया गया है।"

15. रिरकॉड पर मौजूद सामग्री से यह भी प्री होा है विक वाद संख्या 154/

2009 में, वादी ने सीपीसी के आदेश VI विनयम 17 के ह वाद में संशोन करने

के लिलए एक आवेदन दायर विकया र्थीा। सिजस संशोन के लिलए प्रार्थीना की गई है,

वह इस प्रकार है:-

"1. यह विक मामले के शीर्षक में प्रतिवादी संख्या 1 के नाम और पे के

बाद जहां "प्रतिवादी" शब्द लिलखा गया है, उसके बाद "प्रर्थीम पक्ष" शब्द

जोड़ा जाए और प्रतिवादी संख्या 1 के नाम और पे के नीचे

विनम्नलिललिख व्यविक्तयों के नाम और पे प्रतिवादी संख्या 2 से 5 के रूप

में जोड़े जाए।

2. राजीव कु मार पुत्र Oवग;य ओम प्रकाश उम्र करीब 35 साल

3. मुन्ना पुत्र Oवग;य ओम प्रकाश उम्र करीब 33 वर्ष

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

4. गोलू पुत्र Oवग;य ओम प्रकाश उम्र करीब 23 साल

5. श्याम देवी उम्र लगभग 57 वर्ष पत्नी Oवग;य ओम प्रकाश विनवासी

जोप्लिंŽलगंज, सिसटी बलिलया, परगना और सिजला बलिलया।

…. प्रतिवादीगण विद्वीय पक्ष

2. यह विक पैरा-1 के ऊपर की वादपत्र पंविक्त काटी जाए और उसके

Oर्थीान पर

विनम्नलिललिख शब्द लिलखे जाए-

"उपरोक्त वादीगण विनम्नानुसार कर्थीन करे हैं"

3. यह विक वादपत्र के पैरा 1 की अंतिम पंविक्त काटी जाए।

4. यह विक वादपत्र में पैरा-2 की अंतिम पंविक्त में "प्रयास" शब्द लिलखा है

सिजसे काटा जाए और उसके Oर्थीान पर "पूरे" शब्द लिलखा जाए।

5. यह विक वादपत्र में पैरा-4 की दूसरी पंविक्त में "विनम्नलिललिख" शब्द के

बाद लिलखे शब्दों को काटा जाए और उसके Oर्थीान पर विनम्नलिललिख

शब्द जोड़े जायें-

"वर्भिण कमरे के विकसी भाग के संबं में विववाविद काश्कारी का विनबंन

विदनांक 12-02-57 को लिलखा एवं विनष्पाविद विकया गया, बस्थि„क सत्य

थ्य यह है विक प्रतिवादी fमांक 1 के दादा लक्ष्मण प्रसाद विववाविद

कक्ष में विकराएदार की हैसिसय से वर्ष 1953 में 23/- मासिसक विकराए

पर, बाद में प्रतिवादी नंबर 1 के विपा गुलाब चंद जीवन भर विववाविद

कमरे में वर्ष 2005 क विकराएदार के रूप में रहे और प्रतिवादी नंबर 1

के विपा की मृत्यु के बाद प्रतिवादी नंबर 1 विकरायेदार के रूप में रहा,

और समय-समय पर विकराया बढ़ा गया और उसका भुगान विकया

गया, और प्रतिवादी सं. 1 के विपा गुलाब चंद के जीवनकाल में विववाविद

कमरे का विकराया 300/- रुपये हो गया और विकराए का भुगान

Oवग;य लक्ष्मण प्रसाद और गुलाब चंद और वादी और वादी के विपा

द्वारा रसीद पर समय-समय पर विकया गया। इस रह से 31-03-06

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

क, प्रतिवादी नंबर 1 के विपा द्वारा विकराए की अविग्रम राभिश के रूप में

भुगान विकया गया र्थीा, जबविक 2005 में उनकी मृत्यु हो गई र्थीी।"

6. यह विक वादपत्र में संशोति पैरा -4 के बाद पैरा 4(ए) के रूप में

विनम्नानुसार है:

विनम्नानुसार जोड़ा जाए

"4(क) यह विक वादी के विपा के विहOसे में मकान में विकराएदारों में से

कु छ विकराएदारों ने दो मुकदमे वाद संख्या 492/87 राजाराम आविद

बनाम हरिरहर आविद र्थीा वाद संख्या 493/ 87 रामनारायण आविद

बनाम हरिरहर आविद मुंसिसफ पूव; बलिलया के न्यायालय में Oर्थीायी

विनर्षेाज्ञा के लिलए विकया सिजसका विनOारण उक्त प्रकरण संख्या

493/87 में राम नारायण जी बनाम हरिरहर आविद प्रतिवादी सं . 1 के

दादा Oवग;य लक्ष्मण प्रसाद वादी संख्या 3 के रूप में मामले के पक्षकार

र्थीे और उन्होंने 25 रुपये मासिसक विकराए पर वर्ष 1953 से विववाविद

कमरे में होने का दावा करे हुए मुकदमा दायर विकया र्थीा और उक्त

मामले का विनOारण दOावेज़ संख्या 58 क 1 के माध्यम से विकया गया

र्थीा, समझौा दOावेज संख्या 58 क 1 को तिडfी के विहOसे के रूप में

माना गया र्थीा। इस रह यह OपW है विक प्रतिवादी सं. 1 के दादाजी ने

अपने पूरे जीवन में कभी भी बंक विवलेख के आार पर खुद को

विववाविद विकराए के कमरे में रेहनदार के रूप में नहीं विदखाया।

7. यह विक वादपत्र में पैरा-5 के बाद नीचे लिललिख पैरा-5(क) के रूप

में एक पैरा इस प्रकार जोड़ा जाए:-

"पैरा 5 (ए) – यह विक प्रतिवादी संख्या 1 के लिखलाफ 01.04.06 से

विकराया बकाया है और प्रतिवादी संख्या 1 ने विववाविद विकराए के कमरे

में प्रतिवादी दूसरे पक्ष को शाविमल विकया और खुद "भिशवम अOपाल"

नाम से हसील Oकू ल बलिलया के गेट के सामने वि”विनक खोला व

तिचविकत्सक के रूप में प्रैस्थिक्टस करने लगे। त्पˆा बकाया विकराए के

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

लिलए कानूनी नोविटस विदया गया और विववाविद दुकान को खाली करने के

लिलए उप-विकराएदारों को विववाविद कमरा देने के आार पर और विकराए

और क्षति के बकाया के लिलए और बाद में कानूनी नोविटस विदया गया।

विदनांक 15-03-07 को डॉ. गणेश प्रसाद बनाम जज Oमॉल कॉज

सिसविवल जज (एस.डी.) बलिलया राजेश्वर आविद की अदाल में नोविटस

ामील होने के बाद Oमॉल कॉज सूट नंबर 3/2007 दायर विकया गया

र्थीा, सिजसे दालिखल करने के बाद विबना जांच के खारिरज कर विदया गया

र्थीा। मुकदमे को खारिरज करने से प्रतिवादी सं. 1 को कोई कानूनी

अतिकार नहीं विमला है और न ही वह उपरोक्त मुकदमे को खारिरज कर

सका है, विबना परीक्षण उपरोक्त मुकदमे को खारिरज विकए विबना उक्त

मुकदमे को खारिरज करने के आदेश से पूव न्याय के सिसद्धांों द्वारा वर्जिज

नहीं है।

8. यह विक वादपत्र में पैरा-7 की दूसरी पंविक्त में "ज्ञा हुआ" शब्दों के

बाद

और "हम वादीगण" शब्दों से पहले, "प्रतिवादी सं. 1 के विपा" शब्द

जोड़ा जाएऔर उसी पंविक्त में "विपा" शब्द के बाद और "बंक" शब्द से

पहले "Oवग;य हरिरहर प्रसाद" शब्द जोड़ा जाए।

9. यह विक पैरा-8 की चौर्थीी पंविक्त में वादपत्र में जहां "करीब" लिलखा है

उसके बाद "संति" शब्द जोड़ा जाए।

10. यह विक वादपत्र में पैरा-9 की पांचवीं पंविक्त में "Oवामी का हो सका

है" शब्दों के बाद पूरी पंविक्त काट दी जाए और विनम्नलिललिख शब्द जोड़े

जाएं-

"और न ही हो सका है। चूंविक वादी उपरोक्त मामला, जो विववाविद कमरे

के संबं में मकान मालिलक और मालिलक के विववाद से संबंति है और

उक्त विववाविद कमरे का Oवाविमत्व अतिकार प्रतिवादी संख्या 1 के विपा

या प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में उक्त Oवाविमत्व बंक के आार पर

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

Oर्थीानांरिर नहीं विकया गया र्थीा, बस्थि„क वादी और प्रतिवादी संख्या 1 के

बीच विकरायेदारी के अतिकार के विववाविद कमरे के संबं में। Oवाविमत्व

अतिकार और भू-Oवाविमत्व अतिकार अस्थिOत्व में रहे हैं , सिजसे

प्रतिवादी ने उपरोक्त वर्भिण मामले में उनके द्वारा दायर लिललिख बयान

और उपरोक्त वर्भिण मामले में दायर लिललिख बयान लघु कारण मामला

संख्या 3/07 में खारिरज कर विदया है। ऐसी परिरस्थिOर्थीतियों में नीचे वर्भिण

विववाविद कमरे से प्रतिवादी संख्या 1 के Oवाविमत्व अतिकार और कब्जे

के दावे के आार पर प्रतिवादी संख्या 1 का विकरायेदारी का अतिकार

Oवः समाप्त हो गया है, और नोविटस के माध्यम से भी विकरायेदारी

समाप्त कर दी गई है और प्रतिवादी संख्या 1 ने प्रतिवादी विद्वीय को

शाविमल करके उप-विकरायेदार के रूप में पक्षकार ने अपने अतिकार का

दुरुपयोग विकया, सिजसके आार पर भी प्रतिवादी को बेदखल विकया जा

सका है, सिजसके वाद में वांभिछ राह का दावा विकया जा रहा है।"

11. यह विक वादपत्र में पैरा -9 के बाद आगे पैरा 9(ए), 9(बी),

9(सी), 9(डी) को विनम्नानुसार जोड़ा जाए :

परिरच्छेद 9(क) यह विक प्रतिवादी fमांक 1 द्वारा दर्भिश संपलिL बंक

विदनांक 12-02-57 के दOावेज के बारे में पा चलने पर उसकी प्रति

विदनांक 10.09.2008 को प्राप्त की गई र्थीा बंक विवलेख के दOावेज

की सही जानकारी प्राप्त होने पर त्पˆा् हार्थी से भुगान करने के लिलए

विकसी भी कानूनी जविटला से बचने के लिलए बंक विवलेख में उसि~लिख

700/- रुपये और अन्य खच 5100/- रुपये कु ल 5800/- रुपये

और मूल दOावेज लेने के लिलए विदनांक 31-03-09 को कई बार

प्रतिवादी संख्या 1 का दौरा विकया उसने अंः उक्त राभिश या विकसी

अन्य राभिश को लेने या 12-02-57 के Oवाविमत्व बंक विवलेख को

वापस करने से इनकार कर विदया, इसलिलए उपरोक्त मामले में के वल

बंक के विनवहन के लिलए दावा विकया जा रहा है और उपरोक्त मामले में

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

के वल अलग आवेदन सम्पलिL अन्रण अतिविनयम की ारा 83 के

अन्ग रू0 5800/- की नराभिश जमा कराने एवं उक्त राभिश के

सम्बन् में प्रतिवादी fमांक 1 को नोविटस भिभजवाने एवं मूल दOावेज

न्यायालय में जमा करने के उपरान् न्यायालय में जमा कराये जाने के

सम्बन् में उक्त जमा राभिश 5800/- रुपये की प्रातिकृ प्राविप्त हेु

प्रार्थीना पत्र विदया गया है जो विक विवचाराीन है।

पैरा-9(ख) यह विक वाद के अं में कमरे के विववरण का के वल 1/3

भाग वादी के विपा हरिरहर प्रसाद द्वारा प्रतिवादी संख्या 1 के विपा गुलाब

चन्द के पक्ष में विदनांक 12-02-57 को विकराया विगरवी रखा गया है।

पूरा कमरा 700/- रुपए मूल ऋण के ब्याज के एवज में कटौी के बाद

कब्जा विवलेख में उ~ेख विकया गया है। इस प्रकार 700/- रुपये की

मूल राभिश के अतिरिरक्त प्रतिवादी के विपा को कोई अन्य राभिश देय नहीं

रह जाी है। लेविकन 700/- + 5100/- रुपये जमा करने के लिलए

प्रचुर सावानी के रूप में 5800/- रु. कोट में आवेदन में संपलिL

हOांरण अतिविनयम की ारा 83 के ह राभिश दी जा रही है।

पैरा 9 (सी) यह विक वादी के Oवग;य हरिरहर प्रसाद पुत्र वादीगण नीचे

वर्भिण विववाविद विकराएदार कमरे के 1/3 विहOसे के बंनका बने रहे,

सिजनकी मृत्यु के बाद वादी बंकका के कानूनी प्रतिविनति हैं सिजनके

प्रतिवादी नंबर 1 के रेहनदार विपा के बाद सिजसकी मृत्यु प्रतिवादी

संख्या 1 बंकका का कानूनी प्रतिविनति है। उक्त दOावेज़ के विववरण

नीचे विदए गए हैं: -

क. बंक विवलेख की

ारीख

विदनांक 12-02-57 सिजसका पंजीकरण

विदनांक 13-02-57 को पंजी संख्या 1

सिज„द संख्या 1364 पृष्ठ 309 से 311

fमांक 364 में विकया गया र्थीा

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

ख.

बंनग्रहीा एवं

बंनका के नाम

बंनग्रहीा

हरिरहर प्रसाद पुत्र Oवग;य सीाराम गुलाब

चंद

4 क दOावेज के प्रकार

घ - सुरक्षा राभिश

लक्ष्मण प्रसाद के पुत्र, बन्कका;

कब्जाारी बन्क;

700/- (सा सौ रुपये)

ग-ब्याज की दर और

कब्जाारी बन्क विवलेख की

स्थिOर्थीति

न ही विकराया का दावा विकया जाएगा और जेठसुदी

पूणावान पर जो भी वर्ष हो, विबना ब्याज के मूलन

का भुगान विकया जाएगा और उन्मोचन विकया जाएगा

ो विनOपादक का इस दOावेज़ और कमरे से कोई

सरोकार नहीं है।यविद बन्क के कब्जे में कोई बाा

हो ो बेदखली की तिभिर्थी से सौ रूपये में एक रूपये

की दर से मासिसक भुगान की तिभिर्थी क बन्कदार

और उसके उLरातिकारी भुगान करने के लिलए

उLरदायी होंगे।

च - बन्क सम्पलिL -

अंग

शहर बलिलया चौक परगना एवं सिजला बलिलया में रूम

ब्लाक - ए संख्या -25, 26, 27, 28, 29 में 2-

5 का एक तिहाई

चहारदीवारी

पूव; कमरा सरकार का, पतिˆमी कमरा वादी का,

उLरी कमरा वादी का, दतिक्षण कटरा गली

9(घ) – यह विक प्रतिवदी संख्या -1 उक्त बंक विवलेख दOावेज के

आार पर उसके विपा की मृत्यु के बाद विववादग्रO विगरवी कमरे का

1/3 भाग बंकका के कब्जे में है र्थीा विगरवी रखे गए कमरे का 1/3

भाग प्रतिवादी संख्या - १ के कब्जे में है, परिरसीमा अवति के दौरान

प्रतिवादी संख्या 1 के विपा द्वारा कोई नोविटस नहीं विदया गया र्थीा अर्थीवा

प्रतिवादी संख्या 1 के द्वारा वादी के विपा या वादी को 700/- राभिश के

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

भुगान के लिलए बंकका के रूप में और न ही ऐसा कोई नोविटस

ामील विकया गया र्थीा और न ही कभी प्रतिवादी संख्या 1 या उसके

विपा के द्वारा उक्त राभिश की वसूली के लिलए कोई दावा विकया गया र्थीा

और न ही विकराए के कमरे के 1/3 विहOसे के Oवाविमत्व और कब्जे के

अतिकारों के संबं में आपरातिक या संपलिL बंक की विबfी के लिलए

कोई मुकदमा दायर विकया गया र्थीा, इसलिलए वादी के विववाविद कमरा के

1/3 विहOसे के विनवहन का अतिकार उसके पास है, वादी का वाद सभी

स्थिOर्थीतियों में परिरसीमन के ह है।

12. वाद पत्र में पैरा-10 की अंतिम पंविक्त के बाद 'अOवीकृ ' और 'कोई

विवक„प नहीं' शब्दों से पहले, 'विववाविद विकरायेदार कमरे का 2/3

विहOसा जो विकरायेदार का नहीं र्थीा और विववाविद कमरे का के वल 1/3

विहOसा बन्क के रूप में विकरायेदार के पास र्थीा और बन्कका और

बन्कारी के बीच उस 1/3 विहOसे के संबं में जारी रखा गया और

प्रतिवादी संख्या 1 ने वादी के पूरे कमरे के Oवाविमत्व को अOवीकार कर

विदया और विववाविद कमरे का Oवाविमत्व एवं नीचे विदए गये थ्यों के

आार पर Oवाविमव का दावा विकया है जो ीन मंसिजला है इसलिलए

प्रतिवादी संख्या 1 और उसके सह-विकरायेदार प्रतिवादी द्वीय पक्ष के

विववाविद कमरे से विनष्कासन के लिलए उनको वाद में जोड़ा गया है।

13. यह विक अभिभयोग में पैरा -11 की दूसरी पंविक्त के पˆा् "बंक

विवलेख" "शब्दों के पˆा् और "मौजा" शब्द के पूव विनम्नलिललिख शब्द

जोड़े जा सके हैं"

"और बंक विवलेख दOावेज़ वापस करने से इनकार करके और कमरे

की राभिश 700/ रुपये या राभिश 5800/ के 1/3 भाग की बंक राभिश

लेने और कमरे के 1/3 विहOसे को जारी करने और विदनांविक 03-

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

09-08 वर्भिण विववाविद कमरे पर वादी के Oवाविमत्व अतिकार से

इनकार करके वाद लघुवाद वाद संख्या 3/2007 में न्यायाीश लघु

वाद सिसविवल न्यायाीश (एस.डी.) परमेश्वर प्रसाद आविद बनाम डॉ .

गणेश प्रसाद आविद के न्यायालय में र्थीा उपरोक्त वाद के विवरूद्ध दायर

लिललिख कर्थीन के द्वारा खंडन विकया"।

14. वाद के पैरा 12 में शब्दों को काट विदया जाए और विनम्नलिललिख

शब्द जोड़े जाएं -

“यह विक वाद का मू„य जब से विववाविद विगरवी कमरे के एक तिहाई

भाग के सम्बन् में बन्क विवलेख राभिश 700/- रू एवं अन्य खच•

5100 कु ल राभिश 5800 है एवं अन्य खच• प्रार्थीना के लिलए विगरवी रखे गए

कमरे के विनवहन और कब्जे के लिलए प्रचुर सावानी के रूप में भुगान

विकया गया एवं उसे एक तिहाई विनारिर विकया जा रहा है और Oवामी

वादी के कब्जे एवं Oवाविमत्व अतिकार के आार पर बेदखली प्रार्थीना

(ए-1) मू„यांकन के लिलए दायर मुकदमे में वादी रुपये की दर से राभिश

300/- रु. मासिसक बारह गुणा राभिश 3600/- रुपए विनारिर की जा

रही है।इस प्रकार कु ल राभिश 5800 + 3600 = 9400/- रुपए है

सिजस में न्यायालय फीस देय है।”

15. यह विक अभिभयोग में पैरा 12 के बाद और प्रार्थीना से पहले 'वादी'

शब्द 'पैरा 13' लिलखा जा सका हैं।

16. यह विक वादपत्र में वमान प्रार्थीना (क) काट दी जाए और उसके

Oर्थीान पर प्रार्थीना के रूप में विनम्नलिललिख प्रार्थीना "(क)" और "(कक)

को विनम्नानुसार जोड़ विदया जाए-

"(क) विक न्यायालय के आदेश से वाद में नीचे वर्भिण पंजीकृ कब्जा

बंक विवलेख विदनांक 12.02.57 के विनवहन के लिलए इस प्रभाव से

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

पारिर विकया गया र्थीा विक 700/- जमान राभिश का उ~ेख के वल

कब्जा बंक विवलेख में र्थीा एवं अन्य खच• 5100/- राभिश जो कु ल

5800/- रूपये की राभिश को वादी के द्वारा न्यायालय के समक्ष जमा

विकया गया र्थीा सिजसे प्रतिवादी संख्या 1 को शायद सूतिच विकया गया हो

और कब्जा बन्क के वाOविवक दOावेज, वाद के पैरा 9(c) ) में वर्भिण

विकया गया र्थीा को प्रतिवादी संख्या 1 के द्वारा न्यायालय के समक्ष जमा

विकया जा सका र्थीा और प्रतिवादी संख्या 1 के द्वारा कब्जाजन्य बन्क

को मुक्त करने के लिलए इस राभिश और तिडfी को लेने के लिलए अतिकृ

विकया जा सका र्थीा और वादी के पक्ष में या प्रतिवादी के विवरूद्घ पारिर

विकया जा सका र्थीा और न्यायालय के द्वारा इस घटना में असफल होने

पर वाद के पैरा 9(c) ) में बन्क विवलेख के दOावेज विदनांविक

12.02.57 में वर्भिण है को मुक्त विकया जा सका र्थीा और विववाविद

विगरवी रखे कमरे के भाग का कब्जा वादी को विदया जा सका र्थीा और

वाOविवक कब्जा बन्क विवलेख विदनांविक 12.02.57 को न्यायालय के

समक्ष जमा विकया जा सका र्थीा और प्रतिवादी संख्या 1 को उक्त जमा

न को लेने के लिलए अतिकृ करने वाली एक तिडfी को पारिर विकया

जा सका र्थीा।

(ए-1) विक वाद में नीचे वर्भिण विववाविद विकरायेदारी वाले कमरे पर

वाविदयों के कब्जे और प्रतिवाविदयों के बेदखली के लिलए एक तिडfी

अदाल द्वारा पारिर की जा सकी है और न्यायालय का विनरीक्षण के

ह प्रतिवाविदयों को नीचे वर्भिण विकराएदार कमरे को उनके कब्जे से

हटाने का आदेश विदया जा सका है और वादी को उसका कब्जा विदया

जाना चाविहए और असफल होने की स्थिOर्थीति में न्यायालय के एक

अतिकारी/अतिवक्ता आयुक्त के माध्यम से तिडfी का विनष्पादन विकया

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

जा सका है और वादी के पक्ष में और प्रतिवादी के लिखलाफ एक तिडfी

पारिर की जा सकी है।

17. यह विक वाद के प्रार्थीना में नीचे वर्भिण शब्द "विववरण" पूरे शब्दों की

सीामा को काटा जा सका र्थीा एवं उनके Oर्थीान पर विनम्नलिललिख शब्द

जोड़े जा सके हैं-

“शहर बलिलया चौक, परगना बलिलया में ब्लाक संख्या 2-5 A में एक

कमरा संख्या 25, 26, 27, 28, 29 में सिजसमें के वल एक तिहाई

विहOसा बन्क विवलेख दOावेज के ह बन्क है एवं दो तिहाई भाग

बन्क नहीं है और चहारदीवारी के अन्ग पूरा कमरा विववाविद है “

16. वादी द्वारा प्रार्थीना की पूवक्त संशोन का प्रतिवादी द्वारा अपना उLर

दालिखल करके विवरो विकया गया र्थीा।

17. दीवानी न्यायाीश ने विदनांक 20.05.2013 के आदेश विदनांविक द्वारा,

वाविदयों द्वारा विकए गए प्रार्थीना के अनुसार संशोन की अनुमति देने से इनकार कर

विदया और दनुसार, आवेदन को खारिरज कर विदया।

18. वाविदयों ने अपर सिजला न्यायाीश, बलिलया की न्यायालय में एक नागरिरक

पुनरीक्षण आवेदन दायर करके विवद्व दीवानी न्यायाीश द्वारा पारिर पूवक्त

आदेश को चुनौी दी। सिजला न्यायालय ने आदेश विदनांविक 25.02.2015 के

द्वारा पुनरीक्षण आवेदन की अनुमति दी और वादी को अभिभयोग में सुार करने की

अनुमति दी, जैसा की उनके द्वारा प्रार्थीना की गई र्थीी। हालाँविक जैसा विक संशोन

आवेदन, वाद के संOर्थीापन की ारीख से 3 साल के बाद दालिखल विकया गया र्थीा,

पुनरीक्षण न्यायालय ने वादी पर 3,000/- रुपये का लाग आरोविप करना

उपयुक्त समझा।

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

19. अपर सिजला न्यायाीश के द्वारा वादी के द्वारा दालिखल पुनरीक्षण आवेदन को

अनुमति देने के आदेश से असंुW होकर प्रतिवदी द्वारा संविवान के अनुच्छेद 227

के द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष यातिचका दायर करके उक्त आदेश को चुनौी दी।

उच्च न्यायालय ने अपने पयवेक्षी अतिकार क्षेत्र का प्रयोग करे हुए सिजला

न्यायालय द्वारा पारिर आदेश में हOक्षेप करने से इनकार कर विदया और

दनुसार, प्रतिवादी द्वारा दायर आवेदन को विदनांक 04.07.2018 के आदेश द्वारा

खारिरज कर विदया।

20. हाईकोट द्वारा पारिर आक्षेविप आदेश का उपयुक्त भाग इस प्रकार हैः

"यातिचकाका याची के विवद्वान अतिवक्ता श्री चंद्र भान गुप्ता प्रOु करे

हैं विक प्रतिवादी -प्रत्यर्भिर्थीयों ने यह आरोप लगाे हुए प्रश्नग वाद में

विवचाराीन सूट संपलिL को विगरवी रखी गयी र्थीी और उसका कब्ज़ा उन्हें

विदया जा सका है।संशोन आवेदन द्वारा वादी-प्रत्यर्थी; वाद की ारा

83 को हटाने का दावा करे हैं और प्रतिवादी-यातिचकाका के सार्थी

कब्ज़ा का दावा भी विनारिर करना चाहे हैं.विनचली विवचारण न्यायालय

ने 20 मई, 2013 को इस आार पर संशोन आवेदन को खारिरज कर

विदया र्थीा विक इससे मुकदमे की प्रकृ ति बदल जाी है।उपयुक्त आदेश से

असंुW, वादी-प्रत्यर्भिर्थीयों ने दीवानी पुनरीक्षण दायर विकया और इसे 22

फरवरी, 2015 को अनुमति दी गई है।वह आगे प्रOु करे है विक

संशोन आवेदन द्वारा वाद की मुकदमा प्रकृ ति पूरी रह से बदल जाी

है और इस प्रकार, इस न्यायालय को यातिचकाका। को बचाने और वह

दण्डविवराम के लिलए आना चाविहए।

दूसरी ओर, वादी-प्रत्यर्भिर्थीयों के विवद्वान अतिवक्ता श्री राजेश कु मार ने

कहा विक वमान रिरट यातिचका वर्ष 2015 में दायर की गई र्थीी, सिजसमें

25.2.2015. विदनांविक पुनरीक्षण आदेश के ह संचालन पर रोक

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

लगाे हुए 10.4.2015 को एक अंरिरम आदेश पारिर विकया गया र्थीा।

यह मामला वर्ष 2015 से लंविब है और यह मुकदमा वर्ष 2009 से ही

लंविब है।उपयुक्त अंरिरम आदेश के कारण यह मामला विनचली विवचारण

न्यायालय के समक्ष लंविब है।पुनरीक्षण आदेश में कोई दुबला या

अवैा नहीं र्थीी और रिरट यातिचका ख़ारिरज करने के योग्य है।

न्यायालय ने प्रश्नग वाद में अभिभलेखों की जाँच करना प्रारम्भ विकया

और पुनरीक्षण आदेश का भी अवलोकन विकया है और पाया है विक वाद

के पूरे थ्य और परिरस्थिOर्थीतियाँ पर विवचार करने के बाद

,

पुनरीक्षण

न्यायालय का विवचार र्थीा विक संशोन वाद में प्रकृ ति को नहीं बदला है

और अतिवक्ता की गली पर कोई अन्याय नहीं विकया जाना चाविहए।अं

में , वह प्रश्नग दीवानी पुनरीक्षण को अनुमति दी और विनचली विवचारण

न्यायालय के विदनांविक

20.05.2013

के आदेश को अपाO कर विदया।

वह 3000/- रुपये की लाग के सार्थी संशोन आवेदन 35-क की

भी अनुमति दी है।

न्यायालय को पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश में कोई दुबला या

अवैा नहीं विमली है और इसे अनुमोविद विकया जाा है। हालाँविक

संोर्षजनक न्याय के लिलए, संशोन आवेदन को 5000/- रुपये के

खच के सार्थी अनुमति दी जानी चाविहए र्थीी और इसे पक्षकारों द्वारा

Oवीकार विकया जाा है। यविद वादी-12 प्रतिवादी आज से ीन सप्ताह

के भीर 5000/- रुपये जमा करे हैं, ो विवचारण न्यायालय मामले

में कायवाही और पक्षकारों को कोई अनावश्यक Oर्थीगन विदए विबना कानून

के अनुसार कायवाही को विनOारिर करेगी।"

21. पूवक्त को ध्यान में रखे हुए , प्रतिवादी वमान अपील के सार्थी इस

न्यायालय के समक्ष है।

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

अपीलका

- प्रतिवादी की रफ से अभिभवचन

22. अपीलका प्रतिवादी की ओर से उपस्थिOर्थी विवद्वान अतिवक्ता श्री राजीव एम.

रॉय ने जोरदार रूप से कहा विक हाईकोट ने आक्षेविप आदेश पारिर करने में एक

गंभीर त्रुविट की।विवद्वान अतिवक्ता का प्रमुख क यह है विक उच्चन्यायालय का

आक्षेविप आदेश एक अनाख्यापक आदेश है.इस आक्षेविप आदेश में कोई कारण

नहीं बाया गया है।

23. विवद्वान अतिवक्ता ने आगे प्रOु विकया विक उच्च न्यायालय , विवति के एक

महत्वपूण प्रश्न का मू„यांकन करने में विवफल रहा एवं यह विक संशोन ने वाद की

प्रकृ ति को बदल विदया है। वह प्रOु करे है विक जब पहला वाद लघु वाद

न्यायालय में प्रOु विकया गया र्थीा, ो प्रतिवादी को बकाया विकराए के विकराएदार

के रूप में विदखाया गया र्थीा और यह आगे आरोप लगाया गया र्थीा विक प्रतिवादी ने

संपलिLवाद में सह-विकरायेदार को शाविमल विकया र्थीा। विवद्वान अतिवक्ता क देंगे विक

गैर-अभिभयोजन के लिलए लघु वाद न्यायालय में दायर मुकदमे को खारिरज करने के

बाद, वादी ने सिसविवल कोट में एक नया मुकदमा दायर विकया और इसे टीपी

अतिविनयम की ारा 83 के ह एक के रूप में लेबल विकया। बाद में, संशोन के

माध्यम से वादी यह नहीं कह सके र्थीे विक यह मुकदमा टीपी अतिविनयम की ारा

83 के ह नहीं है, लेविकन प्रतिवादी की विकरायेदारी समाप्त की जाए और उसे

दुकान का कब्जा सौंपने का विनद•श विदया जाए।दूसरे शब्दों में, यह क विदया जाा

है विक वादी विकरायेदारी के मामला को विफर से उ~ेख नहीं कर सके र्थीे और

कब्ज़ा की तिड¥fी के लिलए प्रार्थीना नहीं कर सके र्थीे।

24. विवद्वान अतिवक्ता ने जोरदार रूप से प्रOु विकया विक वादी को वाद को दायर

करने की अनुमति देे समय भी, विनचली अदालों को सीपीसी के आदेश 9 के

विनयम 9 के प्रावानों को ध्यान में रखना चाविहए र्थीा , क्योंविक 2009 का वाद

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

संख्या 154 उसी वाद हेुक पर अनुरक्षणीय नहीं है।दूसरे शब्दों में , प्रOाविव

संशोन के माध्यम से, मुकदमा विपछले वाद में अभिभवचन विकए गए वाद हेुक को

विफर से शुरू करने की कोभिशश कर रहे हैं जो गैर-अभिभयोजन के लिलए ख़ारिरज कर

विदया गया र्थीा।विवद्वान अतिवक्ता के अनुसार यह विवति के अनुसार अनुज्ञेय नहीं है.

25. आगे यह क विदया जाा है विक वाद संख्या 1 प्रश्नग सम्पलिL के कब्जा के

लिलए र्थीा, यह के वल लु वाद न्यायालय के समक्ष दायर विकया जाना चाविहए न विक

सिसविवल न्यायालय के समक्ष दायर करना चाविहए र्थीा।

26. विवद्वान अतिवक्ता ने रेवाजीू विब„डस एंड डेवलपस बनाम नारायणOवामी एंड

सन्स एंड अदस (2009) 10 एससीसी 84 के संदभ में इस न्यायालय के फ़ै सला

पर दृढ़ा से भरोसा विकया, यह प्रOु करने के लिलए विक जब प्रOाविव संशोन

संवैाविनक रूप से या मूल रूप से मामला की प्रकृ ति और चरिरत्र को बदला है ो

न्यायालय को वाविदयों को अभिभयोग में सुार करना की आज्ञा देना नहीं देनी

चाविहए।

27. ऊपर संदर्भिभ ऐसी परिरस्थिOर्थीतियों में, अपीलका प्रतिवादी के लिलए उपस्थिOर्थी

विवद्वान अतिवक्ता प्रार्थीना करे है विक उसकी अपील में योग्या होने के कारण ,

उसे Oवीकार विकया जा सका है और आक्षेविप आदेश को अपाO विकया जाा

है।

प्रत्यर्थी;

- वादी के आार पर अभिभवचन

28. दूसरी ओर, इस अपील का मूल वादी की ओर से जोरदार विवरो विकया गया

है, सिजसमें कहा गया है विक उच्च न्यायालय द्वारा आक्षेविप आदेश पारिर करे

समय विवति की विकसी भी त्रुविट के बारे में कु छ नहीं कहा जा सका है।विवद्वान

अतिवक्ता प्रOु विकया विक उच्च न्यायलय ने संविवान के अनुच्छेद 227 के

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

अंग अपनी पयवेक्षी अतिकार क्षेत्र का उपयोग के प्रयोग में वादी को अभिभयोग में

सुार करना की अनुमति देने वाले सिजला न्यायालय द्वारा पारिर आदेश में

हOक्षेप करने से उतिच रूप से इनकार कर विदया।

29. वाविदयों की ओर से उपस्थिOर्थी होने वाले विवद्वान अतिवक्ता के अनुसार ,

सीपीसी के आदेश 9 विनयम 9 के प्रावानों के ह वमान मामले के थ्यों पर

आवेदन नहीं हैं।वह प्रOु करेगा विक सीपीसी के आदेश 9 विनयम 9 की प्रयोज्या

के लिलए, दूसरे वाद में वाद हेुक होना चाविहए।हालाँविक दोनों मुकदमों में वाद हेुक

अलग-अलग है।

30.विवद्वान अतिवक्ता ने आगे प्रOु विकया विक सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 के

विववाद्यक का इस प्रश्न से कोई लेना-देना नहीं है विक क्या अभिभयोक्ता को सीपीसी

के आदेश VI विनयम 17 के प्रावानों के अंग अभिभयोग में सुार करने की

अनुमति दी जानी चाविहए।

31. ऊपर संदर्भिभ ऐसी परिरस्थिOर्थीतियों में, विवद्वान अतिवक्ता प्रार्थीना करे हैं विक

वमान अपील में कोई योग्या नहीं होने के कारण उसे ख़ारिरज विकया जा सका

र्थीा।

विवश्लेर्षण

32. पक्षकारों की ओर से उपस्थिOर्थी विवद्वान अतिवक्ता को सुना और अभिभलेख पर

उपस्थिOर्थी दOावेजों का अध्ययन करने के पˆा हमारे विवचार के लिलए एकमात्र

प्रश्न यह है विक क्या उच्चन्यायालय ने आक्षेविप आदेश पारिर करने में कोई त्रुविट की

है।

33. इसमें कोई संदेह या विववाद नहीं हो सका है विक न्यायालयों को विनयम में

सुार करने की अनुमति के लिलए आवेदन Oवीकार करने में उदार होना चाविहए ,

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

लेविकन यह भी अच्छी रह से विनारिर विकया गया है विक न्यायालयों को नागरिरक

प्रविfया संविहा (संशोन) अतिविनयम के ह लाई गई वैाविनक सीमाओं को

ध्यान में रखना चाविहए और आदेश 6 के विनयम 17 के परन्ुक को उनमें से एक

होना चाविहए। उLर पूव रेलवे प्रशासन, गोरखपुर बनाम भगवान दास (2008) 8

एससीसी 511 में रिरपोट विकया गया है विक इस न्यायालय द्वारा विनम्नलिललिख शब्दों

में कानून विनारिर विकया गया हैः (एससीसी पृष्ठ 517, पैरा 16)

“16.जहां क उन सिसद्धांों का संबं है जो सीपीसी के आदेश 6 विनयम

17 (जैसा विक यह उपयुक्त समय पर र्थीा ) के अंग संशोन प्रदान

करने या अOवीकार करने के सवाल को विनयंवित्र करे हैं, ये भी अच्छी

रह से सुOर्थीाविप हैं।सीपीसी का आदेश 6 विनयम 17 कायवाही के

विकसी भी चरण में अभिभवचनों के संशोन को अभिभविनारिर करा है।

पीरगोंडा होंगोंडा पाविटल बनाम कलगोंडा भिशदगोंडा पाविटल [ए. आई.

आर. 1957 एस. सी. 363] में, जो अभी भी मैदान में है, यह

अभिभविनारिर विकया गया र्थीा विक सभी संशोनों को अनुज्ञा विकया

जाना चाविहए जो दो श- को पूरा करे हैंः(ए) दूसरे पक्ष के सार्थी

अन्याय नहीं करने का, और (बी) पक्षों के बीच विववाद में वाOविवक प्रश्नों

को विनारिर करने के उद्देश्य से आवश्यक होने का।संशोनों से के वल

वहीं इनकार विकया जाना चाविहए जहां दूसरे पक्ष को उसी स्थिOर्थीति में नहीं

रखा जा सका है जैसे विक दलील मूल रूप से सही र्थीी , लेविकन

संशोन से उसे चोट लगेगी सिजसकी लागों में भरपाई नहीं की जा

सकी है।( गजानन जयविकशन जोशी बनाम प्रभाकर मोहनलाल कलवर

[(1990) 1 एससीसी 166 वाद में भी यही देखा गया र्थीा]”

34. पी. ए. जयलक्ष्मी बनाम एच. सारदा और अन्य (2009) 14 एस. सी. सी.

525 के मामला में रिरपोट की गई , इस न्यायालय द्वारा उपरोक्त विटŽपभिणयों को

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

दोहराया गया और उसी को ध्यान में रखे हुए, इस न्यायालय ने पैरा 9 में

विनम्नलिललिख अभिभविनारिर विकया हैः

“9. सिसविवल प्रविfया संविहा (संशोन) अतिविनयम, 1976 के कारण के

द्वारा वादों के शीघ्र विनOारण के लिलए उपाय विकए गए हैं।उपयुक्त संसदीय

वOु को आगे बढ़ाने के लिलए वर्ष 1999 और 2002 में और संशोन

विकए गए।देरी से दलीलों में ससाेंन के लिलए दालिखल आवेदन के ह

हमारा यह दृविWकोण है आदेश 6 विनयम 17 में एक परन्ुक जोड़ा गया

जो विनम्नानुसार है-

“17.अभिभवचनों का संशोन -न्यायालय कायवाही के विकसी भी चरण

में विकसी भी पक्ष को अपने प्रार्थीना की ऐसी रीति से और ऐसी श- पर

बदलने या सुार करना की अनुमति दे सका है जो न्यायसंग हो,

और ऐसे सभी संशोन विकए जाएंगे जो पक्षकारों के बीच विववाद में

वाOविवक प्रश्नों का विनारण करने के प्रयोजन के लिलए आवश्यक

होंःबश• विक विवचारण प्रारम्भ होने के पˆा संसोन के लिलए विकसी भी

आवेदन को अनुमति नहीं दी गइ हो, जब क न्यायालय विनणय क न

पहुच जायें एवं यह विक इमानदारी से प्रतिवाद करने के बावजूद, विवचारण

के प्रारम्भ के पहले मामलें को न्यायालय के समक्ष उठाया जाना चाविहए।"

35. नारायण विप~ई बनाम परमेश्वरन विप~ई और (2000) 1 एस. सी. सी. 712

में एक अन्य मामले में, इस न्यायालय ने ए. के . गुप्ता एंड सन्स लिलविमटेड बनाम

दामोदर घाटी विनगम ए. आई. आर. 1967 एस. सी. 96 के विनम्नलिललिख उद्धरण

को विनर्दिदW विकया, सिजसमें यह अभिभविनारिर विकया गया र्थीाः -

“4. ए. के . गुप्ता एंड सन्स लिलविमटेड न्यायालय दामोदर वैली कापरेशन

[ए. आई. आर. 1967 एस. सी. 96: (1966) 1 एस. सी. आर. 796]

वाले मामले में यह अभिभविनारिर विकयाः

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

"इसमें कोई संदेह नहीं विक सामान्य विनयम यह है विक विकसी पक्षकार को

संशोन द्वारा नया मुकदमा या वाद हेुक य करने की अनुमति नहीं

दी जाी है विवशेर्ष रूप से से जब नया मुकदमा या वाद हेुक वर्जिज

हो:वे„डन बनाम नील [(1887) 19 क्यूबीडी 394:56 एलजे क्यूबी

621]।लेविकन यह भी अच्छी रह से मान्या प्राप्त है विक जहां

संशोन कारवाई के एक नए वाद हेुक को शाविमल नहीं करा है या

एक अलग मामला नहीं उठाा है, लेविकन समान थ्यों के लिलए एक

अलग या अतिरिरक्त दृविWकोण से अतिक नहीं होा है, वहां सीमा की

वैाविनक अवति की समाविप्त के बाद भी संशोन अनुज्ञेय हेागा।चरण

दास बनाम आविमर खान [AIR 1921 PC 50 : ILR 48 Cal 110]

और एल. जे. लीच एंड कं पनी लिलविमटेड बनाम जार्तिडन स्थिOकनर एंड

कं पनी [AIR 1957 SC 357 : 1957 SCR 438] वाद को देखें।"

सिजन प्रमुख कारणों को अंतिम बार उ~ेख विकया गया है, वे हैं, सबसे

पहले, अदालों और प्रविfया के विनयमों का उद्देश्य पक्षकारों के

अतिकारों का फै सला करना है और उन्हें उनकी गलतियों के लिलए

दंतिड करना नहीं है (fॉपर बनाम स्थिOमर्थी [(1884) 26) ChD

700 : 53 LJ Ch 891 : 51 LT 729] )और दूसरी बा, विक एक

पक्ष सख्ी से परिरसीमन की विवति के ह भरोसा करने का हकदार

नहीं है, जब संशोन द्वारा जो कु छ लाने की मांग की जाी है, उसे

संशोति करने की मांग करने वाली दलील में पहले से ही कहा जा

सका है (विकसनदास रूपचंद बनाम राचŽपा विवठोबा) भिशलवं [ILR

(1909) 33 Bom 644 : 11 Bom LR 1042] पीरगोंडा में

Oवीकृ ।

वमान संदभ में 'वाद हेुक' पद का अर्थी 'हर थ्य जो वादी को

सफल होने का हकदार साविब करने के लिलए मू„यवान हो' नहीं है

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

जैसा विक कु क बनाम विगल [(1873) 8 सीपी 107: 42 एलजेसीपी

98 : 28 एलटी 32] में एक अलग संदभ में कहा गया र्थीा , क्योंविक

यविद ऐसा होा, ो कोई भी भौतिक थ्य कभी भी संशोति या

जोड़ा नहीं जा सका र्थीा और विनतिˆ रूप से, कोई विकसी संशोन

द्वारा एक सारहीन आरोप को बदलना या जोड़ना नहीं चाहेगा। वमान

उद्देश्य के लिलए उस पद का अर्थी के वल नए थ्यों द्वारा गविठ एक नए

आार पर विकया गया एक नया दावा है। रॉविबन्सन बनाम यूविनकोस

प्रॉपट; कॉप लिल.[(1962) 2 All ER 24 (CA)] के मामले में ऐसा

विवचार अपनाया गया र्थीा, और हमें लगा है विक यही एकमात्र संभाविव

दृविWकोण है। कोई अन्य विवचार विनयम को विनरर्थीक बना देगा। 'नए

मामले' शब्द का अर्थी 'विवचारों के नए समुच्चय' के रूप में समझा गया है:

डॉनन बनाम जे.डब्„यू. एलिलस एंड कं पनी लिलविमटेड [(1962) 1 All

ER 303 (CA)]। यह भी हमें एक उतिच दृविWकोण लगा है। विकसी

भी पक्षकार द्वारा समय की बीने से प्राप्त विकसी भी अतिकार के

पूवाग्रह के लिलए विवचारों के एक नए समुच्चय को पेश करने के लिलए

विकसी भी संशोन की अनुमति नहीं दी जाएगी।"

पुनˆ गंगा बाई बनाम विवजय कु मार [(1974) 2 SCC 393] में इस न्यायालय ने

ारिर विकया: (SCC पृष्ठ 399, पैरा 22)

"संशोन की अनुमति देने की शविक्त विनOसंदेह व्यापक है और विकसी

भी Oर पर परिरसीमा कानून के बावजूद न्यायविह में उतिच रूप से

प्रयोग की जा सकी है। लेविकन इस रह की दूरगामी विववेकाीन

शविक्तयों का प्रयोग न्यातियक विवचारों द्वारा शासिस होा है और

विववेकातिकार सिजना व्यापक होगा, अदाल की ओर से उनी ही

अतिक सक ा और सावानी बरी जानी चाविहए।"

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

गणेश ट¥ेडिंडग कं पनी बनाम मोजी राम [(1978) 2 SCC 91] में यह

ारिर विकया गया: (SCC पृष्ठ 93, पैरा 4)

"4. अभिभवचनों के मुख्य विनयमों के पूवगामी सारांश से यह OपW है विक

अभिभवचनों में संशोन के प्रावान, लाग और संबंति सभी पक्षों को

संशोनों से उत्पन्न सटीक स्थिOर्थीतियों को पूरा करने के लिलए आवश्यक

अवसर देने जैसी श- के अीन, न्यायविह के उद्देश्य से हैं न विक उसे

हराने के लिलए। यविद कोई पक्षकार या उसका वकील अपने मामले को

शुरू में Oर्थीाविप करने में अक्षम है , ो विनतिˆ रूप से एक पक्ष द्वारा

उठाए गए उतिच कदमों से कमी को विनतिˆ रूप से दूर विकया जा

सका है, जो विन:संदेह अपनी चूक से दूसरे पक्ष को होने वाली

असुविवा या खच के लिलए लाग का भुगान करा है। त्रुविट का ब

क परिरमाजन विकया जा सका है ,जब क सुारात्मक कदम

उपार्जिज अतिकारों को अनुतिच रूप से नुकसान न पहुंचाे हों।"

36. इस न्यायालय के हाल ही के एक विनणय में, भारीय जीवन बीमा

विनगम बनाम संजीव विब„डस प्राइवेट लिलविमटेड और एक अन्य, सिसविवल

अपील संख्या 5909/2022 विदनांक 01.09.2022 के मामले में, कानून

की स्थिOर्थीति को विनम्नानुसार समझाया गया है:-

"70. ..... (ii) सभी संशोनों को अनुमति दी जानी है जो विववाविद

वाOविवक प्रश्न का अवारण करने के लिलए ज़रूरी हैं बश• विक इससे

दूसरे पक्ष के सार्थी पक्षपा या प्रतिकू ल प्रभाव न पड़े। यह अविनवाय है

जैसा विक सीपीसी के आदेश VI विनयम 17 के उLराद्ध में "shall(होगा)"

शब्द के उपयोग से OपW है।

(iii) संशोन के लिलए प्रार्थीना को अनुमति दी जानी है

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

(i) यविद पक्षकारों के बीच विववाद के असरदार और उतिच न्यातियक

विनणय के लिलए संशोन की आवश्यक हो और

(ii) कायवाविहयों की बहुला से बचने के लिलए, बश•

(क) संशोन से दूसरे पक्ष के सार्थी अन्याय न होा हो,

(ख) संशोन द्वारा, संशोन की मांग करने वाले पक्षकार,

विकसी पक्ष द्वारा की गई विकसी ऐसी OपW Oवीकृ ति को वापस लेने

की मांग न करे हों जो दूसरे पक्ष को अतिकार प्रदान करी है

और

(ग) संशोन समयबाति दावे को न उठाा हो, सिजसके

परिरणामOवरूप दूसरा पक्ष (कु छ स्थिOर्थीतियों में) एक मू„यवान

अतिकार से वंतिच हो जाा हो।

(iv) संशोन की प्रार्थीना को सामान्यः अनुमति दी जाना अपेतिक्ष है

जब क परिरस्थिOर्थीतियां ऐसी न हों विक ,(i) संशोन द्वारा, एक

समयबाति दावा पेश करने की मांग की जाी हो, सिजस मामले में यह

थ्य विक दावा समयबाति होगा, विवचार के लिलए एक सुसंग कारक बन

जाा है,

(ii) संशोन वाद की प्रकृ ति में परिरवन कर देा हो,iii) संशोन के

लिलए प्रार्थीना दुभावनापूण हो, या

(iv) संशोन द्वारा, दूसरा पक्ष अपना वै बचाव खो देा हो।

(v) अभिभवचनों के संशोन के लिलए प्रार्थीना पर विवचार करे समय,

न्यायालय को अति कनीकी दृविWकोण से बचना चाविहए और आमौर

पर उदार होने की आवश्यका होी है, खासकर जहां लाग देकर

विवपरी पक्ष की क्षतिपूर्ति की जा सकी है।

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

(vi) जहां संशोन न्यायालय को विववाद पर OपW रूप से विनणय देने में

समर्थी बनाएगा और अतिक संोर्षजनक विनणय देने में सहाया करेगा,

वहां संशोन के लिलए प्रार्थीना को अनुमति दी जानी चाविहए।

(vii) जहां संशोन में के वल एक अतिरिरक्त या एक नया दृविWकोण पेश

करने का प्रयास विकया गया है सिजसमें समयबाति वाद हेुक को शाविमल

नहीं विकया गया है, वहां परिरसीमा अवति की समाविप्त के बाद भी संशोन

को अनुमति दी जानी चाविहए।

(viii) जहां वाद-पत्र में ास्थित्वक विवभिशविWयों के अभाव को सुारने का

आशय विवद्यमान हो वहां संशोन को न्यायोतिच रूप से अनुमति दी जा

सकी है।

(ix) संशोन के लिलए आवेदन करने में विवलंब मात्र, प्रार्थीना को नामंजूर

करने का आार नहीं है।जहां विवलंब का पहलू क योग्य हो, संशोन के

लिलए प्रार्थीना की अनुमति दी जा सकी है और विनणय के लिलए परिरसीमा

के विबन्दु को अलग से विवरतिच विकया जा सका है।

(x) जहां संशोन वाद की प्रकृ ति या वाद हेुक को परिरवर्ति करा है,

सिजससे विक वादपत्र में Oर्थीाविप मामले से भिभन्न , पूणया नया मामला

Oर्थीाविप विकया जा सके , वहां संशोन को नामंजूर कर विदया जाना

चाविहए।हालाँविक जहां संशोन की मांग वाद-पत्र में के वल अनुोर्ष के

संबं में है और उन थ्यों पर आारिर है जो वाद-पत्र में पहले से ही

अभिभवतिच हैं, वहां आमौर पर संशोन को अनुमति देने की आवश्यक

होी है।

(xi) जहां विवचारण के शुरु होने से पहले, संशोन की मांग की जाी है

वहां अदाल से अपेक्षा है विक वह अपने दृविWकोण में उदार हो।न्यायालय

से अपेतिक्ष है विक वह इस थ्य को ध्यान में रखे विक विवरोी दलकार को

संशोन में Oर्थीाविप मामले को देखने का अवसर विमलेगा।इस प्रकार,

जहां संशोन के परिरणामOवरूप विवपक्षी पक्ष पर अपूरणीय प्रतिकू ल

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

प्रभाव नहीं पड़ा है या विवपक्षी पक्षकार विकसी ऐसे लाभ से वंतिच हो

जाा है जो उसे संशोन चाहने वाले पक्षकार द्वारा की गई Oवीकृ ति के

फलOवरूप प्राप्त होा है, वहां संशोन में अनुमति विदया जाना आवश्यक

है।ऐसे ही, जहां न्यायालय के लिलए पक्षकारों के बीच विववाद के मुख्य मुद्दों

पर प्रभावी विनणय देने के लिलए संशोन ज़रूरी है वहां संशोन में

अनुमति दी जानी चाविहए।(विवजय गुप्ता बनाम गगनिंनदर कु मार गांी और

अन्य, 2022 एससीसी ऑनलाइन विद~ी 1897 देखें)"

37. इस प्रकार, वादी और प्रतिवादी वादपत्र, लिललिख कर्थीन में संशोन करने या

अतिरिरक्त लिललिख कर्थीन दालिखल करने के हकदार हैं।हालाँविक यह एक अपवाद के

अीन है विक प्रOाविव संशोन द्वारा, एक विवरोी पक्ष के सार्थी अन्याय नहीं

विकया जाना चाविहए और दूसरे पक्षकार के पक्ष में की गई कोई भी Oवीकारोविक्त

गल न हो।अभिभवचनों के सभी संशोनों की उदारापूवक अनुमति दी जानी

चाविहए जो मुकदमे में वाOविवक विववाद्यकों के अवारण के लिलए ज़रूरी हैं बश•

विक प्रOाविव संशोन वाद -हेूक को परिरवर्ति या नए वाद हेूक को

प्रतिOर्थीाविप नहीं करा हो सिजसके आार पर मूल विववाद्यक उठाया गया र्थीा या

बचाव लिलया गया र्थीा।

38. थ्यों की Oवीकृ स्थिOर्थीति के विवरो में असंग और विवरोाभासी आरोपों या

थ्यों के परOपर विवनाशकारी आरोपों को अभिभवचनों में संशोन के माध्यम से

शाविमल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाविहए।

39. वमान मामले में, लघु वाद न्यायालय में दायर विकया गया पहला मुकदमा

इस आार पर र्थीा विक विकराएदार के रूप में प्रतिवादी का विकराया बकाया र्थीा और

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

उसने विकराए के परिरसर में अवै रूप से उप-विकरायादारों को रख लिलया र्थीा। इस

प्रकार, वाविदयों ने मामले को ऐसे रखा, मानो, पक्षकारों के बीच मकान मालिलक-

विकराएदार का संबं र्थीा।उक्त मुकदमा गैर-अभिभयोजन के लिलए खारिरज कर विदया

गया र्थीा।बाद में, वमान मुकदमा इस प्रार्थीना के सार्थी व्यवहार न्यायालय में दायर

विकया गया विक वाविदयों को बंक को मोतिच कराने और विववाविद संपलिL का

कब्ज़ा वापस लेने की अनुमति दी जाए।

40. ऐसा प्री होा है विक वमान वाद सिजसमें विनचली अदालों ने वादी को

वाद में संशोन करने की अनुमति दी है , वह प्रतिवादी द्वारा पहले वाद अर्थीा्

लघु वाद प्रकरण संख्या 32/2007, में दायर अपने लिललिख कर्थीन में लिलए गए

रुख पर आारिर है, जो गैर-अभिभयोजन के लिलए खारिरज कर विदया गया र्थीा।

हालांविक, ऐसा प्री होा है विक वादी ने अपना मामला नहीं छोड़ा है विक प्रतिवादी

वादग्रO संपलिL में एक विकरायेदार है और उसने उप -विकरायेदारों को रख लिलया

है।वाविदयों का यह भी कहना है विक प्रतिवादी पर विकराया बकाया है।इस प्रकार ,

वमान मुकदमे में वादी का रुख दोरफा है।पहला, विकरायेदार-मकान मालिलक

का संबं और दूसरा, बंक के मोचन का मामला।

41. अभिभवचन इने खराब और लचर हैं विक परिरणामOवरूप , इस अदाल को

यह समझने में बहु कविठनाई हुई विक वादी संशोन के माध्यम से क्या कहना

चाहे हैं।बहु प्रयास के बाद, अं में हम यह समझने में समर्थी हुए हैं विक

अपीलका-प्रतिवादी के विपा, Oवग;य गुलाब चंद वादग्रO संपलिL के बंकदार

र्थीे।वाविदयों के विपा, Oवग;य हरिरहर प्रसाद बंक का र्थीे और उन्होंने अपीलका

प्रतिवादी के विपा के पक्ष में विदनांक 12.02.1957 को 700/- रुपये की राभिश के

लिलए एक बंक विवलेख विनष्पाविद विकया।अपीलका-प्रतिवादी के दादा, Oवग;य

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

लक्ष्मण प्रसाद वर्ष 1953 से 23 रुपये की मासिसक दर से विकरायेदार के रूप में

वादग्रO संपलिL के कब्जे में रहे और बाद में अपीलका -प्रतिवादी के विपा वर्ष

2005 क अर्थीा् अपने विनन क विकरायेदार के रूप में वादग्रO संपलिL पर

काविबज रहे।उसके बाद अपीलका-प्रतिवादी वादग्रO संपलिL का विकराएदार बन

गया।अपीलका प्रतिवादी द्वारा यह बाना चाहा गया है विक वादी के दादा और

विपा वादग्रO संपलिL में विकरायेदार र्थीे और उसी संपलिL के संबं में वर्ष 1957 में

एक बंक विवलेख भी ैयार और विनष्पाविद विकया गया र्थीा।वाविदयों का मामला यह

भी है विक अपीलका प्रतिवादी ने वादग्रO संपलिL में उप -विकरायेदारों को रख

लिलया है।

42. फम श्रीविनवास राम कु मार बनाम महाबीर प्रसाद और अन्य एआईआर 1951

एससी 177 के मामले में इस न्यायालय की ीन-न्यायाीशों की खंडपीठ ने

माना है विक एक पक्ष अपने मामले के समर्थीन में वैकस्थि„पक अभिभवचन लेने का

हकदार है। जहां प्रतिवादी की Oवीकृ स्थिOर्थीति से कु छ हद क वैकस्थि„पक

अभिभवचन उत्पन्न होे हैं, ऐसे अभिभवचन के वल इसलिलए अOवीकाय नहीं है क्योंविक

यह अन्य अभिभवचन से असंग है।यह माना गया विक एक वादी वैकस्थि„पक रूप से

विवभिभन्न अतिकारों पर अवलम्ब रख सका है और सीपीसी में ऐसा कु छ भी नहीं है

जो विकसी पक्ष को वैकस्थि„पक रूप से अनुोर्ष का दावा करने वाले आरोपों के दो

या अतिक असंग सेट बनाने से रोका हो।इसमें आगे कहा गया विक हालांविक

न्यायालय को वादी को ऐसे मामले में अनुोर्ष नहीं देनी चाविहए , सिजसमें उस

अभिभवचन का कोई आार नहीं है, सिजस पर दूसरे पक्ष को नहीं बुलाया गया र्थीा या

सुनने का अवसर नहीं विमला र्थीा, विफर भी जब वैकस्थि„पक मामला जो वादी बना

सका र्थीा, न के वल प्रतिवादी द्वारा अपने लिललिख कर्थीन में Oवीकार विकया गया

र्थीा बस्थि„क OपW रूप से उस दावे के उLर के रूप में सामने रखा गया र्थीा जो वादी

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

ने मुकदमे में विकया र्थीा, वादी को उस मामले पर तिडfी देने में कु छ भी अनुतिच

नहीं होगा जो प्रतिवादी Oवयं बनाा है।

43. यह दृविWकोंण विक वादी वैकस्थि„पक अनुोर्ष की मांग करे समय असंग

अभिभवचन भी करने का हकदार है, इसे इस न्यायालय द्वारा जी. नगम्मा और एक

अन्य बनाम सिसरोमनम्मा और एक अन्य (1996) 2 एससीसी 25 में दोहराया

गया र्थीा। उस मामले में, अपीलकाओं द्वारा पुन: हOानांरण के एक समझौे के

विवविनर्दिदW अनुपालन के लिलए एक मुकदमा दायर विकया गया र्थीा।बाद में, वाद-पत्र

के संशोन के लिलए एक आवेदन चाहा गया र्थीा सिजसमें कहा गया र्थीा विक विबfी

विवलेख के विनष्पादन और पुन: हOानांरण के लिलए एक दOावेज प्राप्त करने का

संव्यवहार एक ही संव्यवहार र्थीा, अर्थीा् यह सश विबfी द्वारा बंक र्थीा।

इसलिलए, वैकस्थि„पक रूप से वादी ने बंक के मोचन के अनुोर्ष की मांग की।

विवचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय ने इस आार पर इसे खारिरज कर विदया

विक मुकदमा विवविनर्दिदW अनुपालन के लिलए दायर विकया गया र्थीा और संशोन से

मुकदमे की प्रकृ ति के सार्थी-सार्थी वाद-हेूक भी बदल जाएगा। लेविकन इस

न्यायालय ने उक्त विनणय को उलट विदया और कहा विक चूंविक उसमें वादी वैकस्थि„पक

अनुोर्ष की मांग कर रहा र्थीा, वह असंग दलीलों का भी अभिभवचन करने का

हकदार है और यह विक वाद-पत्र के संशोन से न ो वाद-हेूक बदलेगा और न

ही अनुोर्ष प्रभाविव होगा।

44. प्रफु ~ मनोहर रेले बनाम कृ ष्णाबाई नारायण घोसालकर और अन्य (2014)

11 एससीसी 316 में, इस न्यायालय ने फम श्रीविनवास राम कु मार (उपरोक्त) में

विदए गए विनणय का अनुसरण और इस सिसद्धां को दोहराया विक वादी द्वारा

वैकस्थि„पक और असंग अभिभवचन लिलए जा सके हैं। उस मामले में, उसमें वादी

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

ने अभिभकभिर्थी विकया र्थीा विक उसमें प्रतिवादी और उसके विवतिक प्रतिविनति वाद

परिरसर में मुफ् लाइसेंसारिरयों के रूप में कब्जा कर रहे र्थीे और इस रह के

लाइसेंस की समाविप्त पर, वादी कब्जे के लिलए तिडfी का हकदार र्थीा। विवचारण

न्यायालय ने पाया विक प्रतिवादी विकराएदार र्थीे न विक लाइसेंसारी जैसा विक वादी

ने अभिभकभिर्थी विकया र्थीा। प्रर्थीम अपीलीय न्यायालय ने इसके विवपरी एक विनष्कर्ष

दज विकया, सिजसमें कहा गया विक प्रतिवाविदयों को मानवीय आार पर वादी द्वारा

वादग्रO संपलिL में और मुफ् लाइसेंसारिरयों के रूप में रहने विदया गया र्थीा और

लाइसेंस को वादी द्वारा वै रूप से समाप्त कर विदया गया र्थीा। इस प्रकार, इसने

प्रतिवाविदयों की इस प्रतिरक्षा को नकार विदया विक वे विकरायेदार र्थीे।वादपत्र में ही ,

वादी ने एक वैकस्थि„पक अभिभवचन विकया र्थीा विक वह सद्भावपूवक व्यविक्तग

आवश्यका, प्रतिवाविदयों द्वारा कभिर्थी ौर पर परिरसर और उससे संबंति

आसपास के बाग की भूविम को कारिर बाा, छेड़छाड़ और हुए नुकसान के आार

पर परिरसर के खाली कब्जे का हकदार र्थीा। इस न्यायालय ने माना विक वादी की

वैकस्थि„पक दलील और प्रतिवाविदयों द्वारा Oर्थीाविप बचाव एक दूसरे से अलग नहीं

र्थीे। न्यायालय ने कहा विक वादी न के वल लाइसेंस का अभिभवचन लेने के लिलए

बस्थि„क कब्जे के प्रत्युद्धरण के अनुोर्ष के लिलए अपने अभिभवचन के समर्थीन में

वैकस्थि„पक रूप से विकरायेदारी का अभिभवचन करने के लिलए भी Oवंत्र र्थीा।

न्यायालय ने माना विक उसमें प्रतिवाविदयों ने विवशेर्ष रूप से Oवीकार विकया र्थीा विक

संपलिL वादी की है और वे विकरायेदारों के रूप में उसके कब्जे में र्थीे और यह

विववाद्यक भी बनाया गया र्थीा विक क्या प्रतिवादी लाइसेंसी के रूप में या विकरायेदारों

के रूप में कब्जे में र्थीे, और प्रतिवाविदयों के पास अपने संबंति मामले को साविब

करने का पूरा मौका र्थीा। इसलिलए प्रतिवाविदयों को वादी द्वारा अभिभवतिच वैकस्थि„पक

मामले को अचानक लिलया गया नहीं कहा जा सका है और न ही न्यायालय द्वारा

वैकस्थि„पक यातिचका को अनुमति विदए जाने और विवचारण विकए जाने से उनके सार्थी

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

कोई अन्याय हो सका है।यह पाया गया विक भले ही अपीलका द्वारा दायर

मुकदमे में वैकस्थि„पक अभिभवचन को उठाने की अनुमति नहीं दी गई र्थीी, वह विनतिˆ

रूप से उस अभिभवचन को उठाने और उसी आार पर दायर एक अलग मुकदमे में

बेदखली की मांग करने का हकदार होगा।

45. अपीलका के विवद्वान अतिवक्ता द्वारा उद्धृ रेवाजीु विब„डस (उपरोक्त) के

मामले में, इस न्यायालय की दो-न्यायाीश की पीठ सीपीसी के आदेश 6 विनयम

17 पर विवचार कर रही र्थीी। उस मामले में, उर्षा बालासाहेब Oवामी और अन्य

बनाम विकरण अपासो Oवामी और अन्य (2007) 5 एससीसी 602 के मामले में

इस न्यायालय द्वारा विदए गए विनणय का अनुसरण विकया गया र्थीा।.इसने मैसस

गणेश ट¥ेडिंडग कं पनी बनाम मोजी राम (1978) 2 एससीसी 91 में रिरपोट विकए गए

फै सले का उ~ेख विकया, सिजसमें प्रOर 50 में, इस न्यायालय ने पाया विक यविद

कोई वादी कारवाई के कारण को बदलना चाहा है और संशोन के माध्यम से

इसे अप्रत्यक्ष रूप से पेश करा है उसकी दलीलों में, कारवाई का एक पूरी रह

से नया या असंग कारण, वOुः एक नए वाद के प्रतिOर्थीापन या कारवाई के

एक नए कारण के Oर्थीान पर जो मूल रूप से र्थीा, न्यायालय इसे अनुमति देने से

इंकार कर देगा, यविद यह वंतिच करने की राभिश है पाट; , सिजसके लिखलाफ एक

मुकदमा लंविब है, विकसी भी अतिकार का जो समय बीने के कारण उसके पक्ष में

अर्जिज हो सका है।

46. हमारी सुविवचारिर राय में, उपरोक्त विटŽपभिणयां भी अपीलका की सहाया के

लिलए नहीं आी हैं, क्योंविक, यहां क विक, गणेश ट¥ेडिंडग कं पनी (उपरोक्त) के

विनणय में भी, इसने फम श्रीविनवास राम कु मार (उपरोक्त) में इस अदाल के

ीन-न्यायाीशों की पीठ के विनणय को संदर्भिभ नहीं विकया र्थीा।

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

47. घटना में, अगर प्रत्यर्थी; द्वारा संशोन के माध्यम से पेश की जाने वाली

दलील भी दलील है, सिजसे प्रत्यर्थी; ने अपने लिललिख बयान में संस्थिOर्थी विकया है

और प्रत्यर्थी; की ऐसी दलील एक वैकस्थि„पक यातिचका है, भले ही यह मूल दलील

के सार्थी असंग हो, चूंविक प्रतिवादी के लिलए कोई पूवाग्रह नहीं है , इसलिलए

न्यायालय को संशोन की अनुमति देने से रोका नहीं गया है।

48. इस Oर पर, हम मध्य प्रदेश राज्य बनाम भार संघ और एक अन्य

(2011) 12 एससीसी 268 मामले में इस अदाल के फ़ै सले का अवलम्ब ले

सके हैं। हम विनणय के प्रOर 8 में विनविह प्रासंविगक विटŽपभिणयों को उद्धृ करे

हैं: -

“8. संविहा के आदेश 6 के विनयम 17 का उद्देश्य और विवर्षय विकसी भी

पक्षकार को अपने अभिभवचनों को ऐसी रीति से और और ऐसी श- पर ,

जो न्यायसंग हो, परिरवर्ति करने या सुार करना में अनुमति देना है।

संशोन को सही के रूप में और सभी परिरस्थिOर्थीतियों में दावा नहीं विकया

जा सका है

,

लेविकन अदालों को ऐसी प्रार्थीनाओं का फै सला करे

समय अति कनीकी दृविWकोण नहीं अपनाना चाविहए। उदारवादी

दृविWकोण सामान्य विनयम होना चाविहए

, विवशेर्ष रूप से से उन मामलों में

जहां दूसरे पक्ष को लाग के सार्थी क्षतिपूर्ति की जा सकी है।सामान्य

रूप से

,

मुकदमों की अतिका को टालने के लिलए अभिभवचनों में

संशोनों की अनुमति दी जाी है।”

(प्रभाव वर्ति)

49. अपीलार्थी; प्रत्यर्थी; ने सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 की प्रयोज्या के संबं

में एक क भी विदया है विक संशोन की अनुमति नहीं दी जानी चाविहए क्योंविक

वमान मुकदमा अपने आप में अनुरक्षणीय नहीं है क्योंविक सीपीसी के आदेश IX

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

विनयम 8 के प्रावानों के ह छोटे मामले में पहले दायर विकया गया मुकदमा गैर-

अभिभयोजन के लिलए खारिरज कर विदया गया र्थीा।

50. हम इस Oर पर यह कहे हुए मामला को बंद कर सके र्थीे विक यविद

अपीलार्थी; प्रत्यर्थी; का यह मामला है विक वमान मुकदमा सीपीसी के आदेश IX

विनयम 9 के मद्देनजर अनुरक्षणीय नहीं है, ो उसके लिलए आदेश VII विनयम 11 के

ह वाद की अOवीकृ ति के लिलए एक आवेदन दायर करके विनचली अदाल के

समक्ष इस रह की यातिचका दायर करने का अतिकार होगा।हालाँविक हमारा विवचार

है विक चूंविक प्रविfयात्मक कानून का एक महत्वपूण प्रश्न उठाया गया है , हम इस

अवसर पर इस अपील में ही यह OपW करने का अवसर लेे हैं विक सीपीसी के

आदेश IX विनयम 9 की दलील क्यों विवफल होनी चाविहए।

51. आदेश IX का विनयम 9 इस प्रकार हैः

“9. चूक होने पर वादी के विवरुद्ध तिडfी नए वाद को रोकी है। (1)

जहां कोई वाद विनयम 8 के अीन पूण: या आंभिशक रूप से खारिरज कर

विदया जाा है, वहां वादी को उसी वाद हेुक के संबं में नया वाद लाने

से रोका जाएगा। लेविकन वह बखाOगी को अपाO करने के आदेश के

लिलए आवेदन कर सका है, और यविद वह न्यायालय को संुW करा है

विक जब वाद को सुनवाई के लिलए बुलाया गया र्थीा, ब उसके उपस्थिOर्थी

न होने के पयाप्त कारण र्थीे और न्यायालय ऐसी श- पर बखाOगी को

अपाO करने का आदेश देगा और मुकदमे की कायवाही के लिलए एक

विदन विनय करेगा जो लाग के लिलए या जैसा उतिच समझे।

(2) इस विनयम अंग कोई आदेश ब क नहीं विकया जाएगा जब क

विक आवेदन की सूचना विवपक्षी पक्षकार को ामील न कर दी गई हो। ”

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

52. जैसा विक सीपीसी के आदेश IX विनयम 8 में दशाया गया है विक आदेश IX

विनयम 9 पहले के मुकदमे को खारिरज कर विदए जाने की स्थिOर्थीति में कारवाई के वाद

हेुक के संबं में नए मुकदमे पर रोक लगाा है।यविद बाद के वाद में वाद हेुक

पूरी रह से अलग र्थीा, सिजसका पूव के मुकदमे में वाद हेुक से कोई लेना-देना

नहीं है, ो वैाविनक बार ऐसे बाद के मुकदमों पर लागू नहीं होा है।कारवाई के

एक ही कारण के आार पर, यह के वल एक से अतिक मुकदमे दायर करने की

प्रवृलिL को रोकने के उद्देश्य से र्थीा और पूव के मुकदमे के खारिरज होने के बाद भी

fविमक रूप से ऐसा प्रावान पेश विकया गया है।व्यवOर्थीाविपका का यह इरादा यह

नहीं र्थीा विक पक्षकारों के बीच बाद के मामलों पर रोर लगाई जाए और उसा विवशेर्ष

शब्दों, "उसी वाद हेुक" से OपW र्थीा।इसलिलए सब कु छ कारवाई के कारण पर

विनभर करा है और अगर बाद में कारवाई का कारण थ्यों के एक पूरी रह से

अलग समूह से उत्पन्न होा है, ो सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 के प्रावान

का संदभ लेकर इस रह के मुकदमे को समाप्त नहीं विकया जा सका है।

53. इस अदाल ने गया नगरपालिलका बनाम राम प्रसाद भट्ट और अन्य मामले में

विदनांक 8 सिसंबर, 1967 को सिसविवल अपील संख्या 29/1965 में सीपीसी के

आदेश IX के विनयम 9 की व्याविप्त को इस प्रकार समझायाः

"हमारे विवचार में, वमान मुकदमा सीपीसी के आदेश IX के विनयम 9

द्वारा वर्जिज नहीं है।मोहम्मद खलील खान बनाम महबूब अली खान

एआईआर (1949) पीसी 78 में विप्रवी काउंसिसल द्वारा दो मुकदमों में

कारवाई के कारण अलग-अलग हैं या नहीं, यह विनारिर करने के

सिसद्धां विनारिर विकए गए र्थीे और सूरज रन भिर्थीरानी बनाम आजमाबाद

टी कं पनी ए. आई. आर. (1965) SC 295 में इस न्यायालय द्वारा

अनुमोदन के सार्थी संदर्भिभ विकया गया।सवाल के वल यह है विक क्या इन

सिसद्धांों को लागू करना उच्च न्यायालय का यह विनणय सही र्थीा विक वाद

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

हेुक वमान वाद में 1941 के वाद से भिभन्न र्थीा।हमें ऐसा प्री होा है

विक यविद दोनों वादों का सूक्ष्म विवश्लेर्षण विकया जाा है , ो यह प्री

होगा विक पहले वाद में भिशकाय का कारण प्रत्यर्थी; नगरपालिलका द्वारा

वादी के कभिर्थी अतिकारों में हOक्षेप करने के लिलए उसके घर के दतिक्षण

में ुरं Oटालों का विनमाण करने का खरा र्थीा।उस समय कोई Oटाल

नहीं बनाया गया र्थीा और वादी की कभिर्थी अतिकारों का वाOव में

उ~ंघन नहीं विकया गया र्थीा।मुकदमे के दौरान Oटॉल का विनमाण शुरू

विकया गया र्थीा, और इसे वादी के घर से कु छ पयाप्त दूरी पर पूरा विकया

गया र्थीा, बाद में मुकदमा तिडफ़ॉ„ट के कारण खारिरज कर विदया गया र्थीा।

इसके आगे 1941 के मुकदमे में भिशकाय की गई र्थीी विक नगरपालिलका

नाले के दतिक्षण में फु टपार्थी का उपयोग करने के मुकदमा का उ~ंघन

विकया जा रहा र्थीा, सिजस फु टपार्थी का कभिर्थी रूप से पैदल यावित्रयों और

वादी की दुकान के ग्राहकों द्वारा उपयोग विकया गया र्थीा; ऐसा कोई

आरोप नहीं र्थीा विक हैलीडे रोड क पहुँचने के उनके मुकदमा को मकी

दी जा रही र्थीी या उ~ंघन विकया जा रहा र्थीा।वमान वाद में जो पयाप्त

रूप से आरोप लगाया गया है वह यह है विक वादी को उक्त Žलॉट संख्या

11459 के चारों ओर से घर क पहुंचने का अतिकार र्थीा, जो विक वादी

के घर के सामने स्थिOर्थी र्थीा।यह भी ध्यान विदया जाएगा विक वमान

वादपत्र, वादी के हैलीडे रोड क पहुंच के कभिर्थी अतिकार के Oर्थीायी

अभाव का आरोप लगाा है।विनमाण एक Oर्थीायी प्रकृ ति के हैं, और हमारे

विवचार में, 1942 में Oटालों का विनमाण होने पर कारवाई का एक नया

कारण सामने आया।”

54. वाद हेुक क्या है यह अब विकसी भी संदेह से परे य हो गया है।उस

अभिभव्यविक्त की जे कु क बनाम हेनरी एस. विगल (1873) एलआर 8 सीपी 107 में

न्यायमूर्ति ब्रेट की सही परिरभार्षा इस प्रकार हैः-

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

” 'वाद हेुक' को प्रारंभिभक समय से हर उस थ्य के रूप में माना गया

है, जो प्रत्यर्थी; को सफल होने के लिलए साविब करने के लिलए महत्वपूण है,

- प्रत्येक थ्य सिजसे पार करने का अतिकार प्रत्यर्थी; के पास होगा।”

55. न्यायमूर्ति फ्राई ने इसे यह कहे हुए नकारात्मक व्यक्त विकया विक, "जो कु छ

भी, यविद साविब नहीं हुआ है", प्रत्यर्थी; को विनणय का त्काल अतिकार देा है

ो कारवाई के कारण का विहOसा होना चाविहए। यह परिरभार्षा 'वाद हेुक' की

अभिभव्यविक्त की व्याख्या वाले बाद के सभी विनणयों का आार है।इसे दीप नारायण

सिंसह बनाम विमन्नी डायटट और अन्य, आईएलआर (1904) 31 Cal 274, पृष्ठ

282 और विप्रवी काउंसिसल द्वारा मोहम्मद खलील खान और अन्य बनाम महबूब

अली विमयां और अन्य, एआईआर 1949 पीसी 78, पृष्ठ 86, पैरा 61 विबन्दु

संख्या 2 में Oवीकार विकया गया र्थीा।

56. उपयुक्त मामले यह भी OपW करे हैं विक विकसी वाद में वाद हेुक का वाद में

लिलए गए बचाव से कोई संदभ नहीं होा है, न ही यह उस साक्ष्य से संबंति होा

है सिजसके द्वारा वाद हेुक Oर्थीाविप होा है।मोहम्मद खलील खान (उपरोक्त) में,

सिजसका हमने ऊपर उ~ेख विकया है, यह निंबदु विप्रवी कौंसिसल के पैरा 61, निंबदु

संख्या (5) के विनणय में इस प्रकार उ~ेख विकया है:-

“वाद हेुक का बचाव से कोई संबं नहीं है जो न ो प्रत्यर्थी; द्वारा

Oर्थीाविप विकया जा सका है और न ही यह वादी द्वारा प्रार्थीना की गई

राह की प्रकृ ति पर विनभर करा है।यह मीतिडया को संदर्भिभ करा है

सिजस पर वादी अदाल से अपने पक्ष में विनष्कर्ष पर पहुंचने के लिलए

कहा है।“

57. वाद हेुक को भी 'उपचार' से अलग विकया जाना चाविहए जो वह सान या

रीका है सिजससे वाद हेुक या संबंति दातियत्व प्रभाविव होा है और सिजसके

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

द्वारा एक गल विनवारण विकया जाा है और राह प्राप्त की जाी है।एक पहले से

है और दूसरे को जन्म देा है, लेविकन वे एक दूसरे से अलग और भिभन्न हैं और

विवभिभन्न विनयमों और सिसद्धांों द्वारा शासिस हैं।वाद हेुक वह दातियत्व है सिजससे

"कारवाई" उत्पन्न होी है, सिजसे बाध्या को लागू करने के अतिकार के रूप में

परिरभाविर्ष विकया गया है, वाद हेुक ब उत्पन्न होा है जब जो विकया जाना

चाविहए र्थीा वह नहीं विकया जाा है या जो नहीं विकया जाना चाविहए र्थीा वह हो गया

हो। इस प्रकार वाद हेुक के आवश्यक त्व वादी में कानूनी अतिकार का

अस्थिOत्व है सिजसके सार्थी प्रतिवादी में अनुरूपी कानूनी कव्य है, और वादी को

परिरणामी चोट या क्षति के सार्थी उस 'अतिकार या कव्य' का उ~ंघन सिजसके लिलए

वह उतिच राह के लिलए कारवाई कर सका है।विकसी कायवाही को बनाए रखने

का अतिकार वाद हेुक के अस्थिOत्व पर विनभर करा है सिजसमें वादी के अतिकार

और प्रतिवादी द्वारा ऐसे अतिकार के उ~ंघन का संयोजन शाविमल है। प्रतिवादी की

ओर से कव्य अनुबं से उत्पन्न हो सका है या अनुबं से Oवंत्र सकारात्मक

कानून द्वारा अतिरोविप विकया जा सका है, यह कव्य के उ~ंघन से उत्पन्न हो

सका है। Oवैस्थिच्छक अनुबं या सकारात्मक कानून द्वारा वादी के पक्ष में प्रतिवादी

पर लगाए गए कु छ कव्य के उ~ंघन से वादी के अतिकार के हOक्षेप से वाद

हेुक उत्पन्न होा है। (देखें: सरदार बलबीर सिंसह बनाम आत्मा राम श्रीवाOव,

एआईआर 1977 आल 211 (एफबी))

58 दूसरे, वाद हेुक को उस प्रमाण से भिभन्न विकया जाना चाविहए सिजसके आार

पर वाद हेुक साविब होा है और यद्यविप एक का दूसरे से कोई संबं नहीं है विफर

भी वाद हेुक प्रकृ ति को उस प्रमाण की प्रकृ ति से उपदर्भिश विकया जा सका है

सिजसके द्वारा वह समर्भिर्थी है। इसे विफर से मोहम्मद खलील खान (उपरोक्त) पैरा

61, पृष्ठ 86, निंबदु संख्या 3 और 4 में OपW विकया गया है, जो इस प्रकार हैं: -

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

“(3) यविद दो दावों के समर्थीन में साक्ष्य भिभन्न हैं, ो वाद हेुक भी भिभन्न

होे हैं।...

"(4) दो वादों में वाद हेुक को एक ही माना जा सका है यविद सार रूप

में वे समान हैं।"

59. इस अदाल ने सूरज रन भिर्थीरानी और अन्य बनाम आजमाबाद टी कं पनी

लिलविमटेड और अन्य एआईआर 1965 एससी 295 के मामले में मोहम्मद खलील

खान (उपरोक्त) में विप्रवी काउंसिसल के फै सले को संज्ञान में लिलया र्थीा।इस अदाल

ने, सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 के वाOविवक ात्पय की व्याख्या करे हुए,

प्रOर 29 और 30 में विनम्नलिललिख रूप में विटŽपणी कीः

“28. वाद हेुक थ्यों का समूह है सिजसके आार पर राह का दावा

विकया जाा है।यविद प्रर्थीम वाद में अभिभकभिर्थी थ्यों के अतिरिरक्त , और

भी थ्य आरोविप हैं और उनके आार पर भी राह मांगी गई है, और

उन्होंने अक्टूबर 1934 में कब्जे और बेदखली के आरोपों के बारे में

अतिरिरक्त थ्यों की व्याख्या की , ब कानून में स्थिOर्थीति यह र्थीी विक

मुकदमे का पूरे थ्य बदल विदये जाे हैं सिजसके परिरणामOवरूप आदेश

IX विनयम 9 के शब्द "उसी वाद हेुक के संबं में" संुW नहीं होे हैं

और वादी दूसरे वाद में पूरे वाद हेुक को विफर से शुरू करने का हकदार

है। इस क के समर्थीन में, विवद्वान अतिवक्ता ने कु छ विनणयों में कु छ

अवलोकनों पर हमारा ध्यान आकर्दिर्ष विकया, सिजसका उ~ेख करना हम

आवश्यक नहीं समझे क्योंविक हमें क में कोई सार नहीं विदखा।

29. हम मोहम्मद खलील खान बनाम महबूब अली विमयां [75 IA 121]

में दो मुकदमों में वाद हेुक की पहचान विनारिर करने के लिलए न्यातियक

सविमति द्वारा अपनाया गया परीक्षण सही है और प्रावान की उतिच

व्याख्या को सही ढंग से व्यक्त करा है।सिसविवल प्रविfया संविहा के

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

आदेश 2 विनयम 2 के प्रOर (1) में समान संदभ में आने वाली

अभिभव्यविक्त "वही वाद हेुक" के अर्थी की विवOृ चचा के बाद उस

मामले में सर मावन नायर ने विनम्नलिललिख विटŽपणी कीः

”विपछले मुकदमे में वाद हेुक के रूप में, इस बा पर विवचार करने के

लिलए विक बाद के मुकदमे में वाद हेुक समान है या नहीं, लागू विकया जाने

वाला परीक्षण वाOव में दो वादों में वाद हेुक - कनीकी रूप से नहीं

- समान है/हैं?”

60. इस प्रकार, हम यह कहे हुए इसका सारांश विनकाल सके हैं विक सीपीसी के

आदेश IX विनयम 9 में यह प्रावान है विक जब वाद पूण या आंभिशक रूप से विनयम

8 के अंग ख़ारिरज कर विदया जाा है (व्यतिfम के लिलए ख़ारिरज कर विदया

जाा है) ो उसी वाद हेुक संबं में मुकदमा को नया वाद लाने से रोका जाएगा।

वमान वाद अर्थीा्, पूव; सिजला बलिलया के दीवानी न्यायाीश (जे. डी.) वाद सं.

154/ 2009, की अदाल में दायर उसी वाद हेुक पर दालिखल नहीं विकया गया

है।वमान वाद में, विवक„प के रूप में प्रOु वादी का मामला यह है विक प्रतिवादी

वाद संपलिL के कब्जे में एक बन्कग्राही के रूप में है और वे विगरवी रखी गई राभिश

का आवश्यक भुगान करके बंक को छु ड़ाने और कब्जा वापस लेने के लिलए

ैयार हैं।सिजस राह की प्रार्थीना की गई है उसका समय विनारिर है या नहीं,

इसका फै सला विनचली अदाल को उन सबूों के आार पर य करना है जो

पक्षकार ले सके हैं।जैसा विक विप्रवी काउंसिसल द्वारा मोहम्मद खलील खान

(उपरोक्त) में कहा गया है यविद दो दावों के समर्थीन में साक्ष्य भिभन्न हैं ो वाद हेुक

भी भिभन्न हैं।इस रह सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 के प्रावानों के आार पर

उठाए गए विववाद में कोई गुण नहीं है।

61 इस मामले को भिभन्न दृविWकोण से भी देखा जा सका है।मान लें विक पहले

मुकदमे में भी वादी ने राह के लिलए प्रार्थीना की र्थीी, जैसा विक वमान मुकदमे में

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

प्रार्थीना की गई र्थीी, बंक के उन्मोचन की मांग की र्थीी। ऐसी परिरस्थिOर्थीतियों में भी,

चाहे दोनों वादों में दोनों अनुोर्ष समान हैं और वाद हेुक भी एक ही है, सीपीसी

के आदेश IX विनयम 9 के प्रावान वमान मुकदमे की स्थिOर्थीरा के लिलए एक बार

के रूप में काम करेंगे। मोचन का अतिकार, एक कानून द्वारा विगरवी रखने वाले को

प्रदान विकया गया अतिकार है, सिजससे वह के वल उस उद्देश्य के लिलए सांके तिक

रीके से वंतिच विकया जा सका है और इसका सख्ी से अनुपालन विकया जाा

है। श्रीर सदबा पवार बनाम गानू महादु कावडे और अन्य के मामले में

आईएलआर (1928) 52 Bom 111 में, मोचन के लिलए एक मुकदमा दायर

विकया गया र्थीा लेविकन सीपीसी के आदेश IX, विनयम 8 के ह खारिरज कर विदया

गया र्थीा। बंकका ने मोचन के लिलए दूसरा मुकदमा लाया और यह क विदया

गया विक यह सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 के ह वर्जिज र्थीा। न्यायमूर्ति माटन,

सीजे और fम्प, ने इस दलील को खारिरज कर विदया। विवद्वान न्यायाीशों ने

रामचंद्र कोलाजी पाविटल बनाम हनमंर्थीा ILR (1920) 44 Bom 28 939 सविह

बॉम्बे उच्च न्यायालय के पूव के विनणयों पर अवलम्ब लिलया , और कहा विक विप्रवी

काउंसिसल के विनणय ठाकु र शंकर बख्श बनाम दया शंकर और अन्य (1887) LR

15 IA 66 में उनके द्वारा लिलए गए दृविWकोण के लिखलाफ नहीं र्थीा , क्योंविक यह

कानून की एक अलग स्थिOर्थीति पर य विकया गया र्थीा। विवट्ठल राजाराम सुार और

अन्य बनाम रामचंद्र पांडु जाव और अन्य एआईआर 1948 बम 226 में, बाम्बे

उच्च न्यायालय की एक पूण पीठ ने विनणय विदया विक सीपीसी के आदेश XXII

प्रविfया 9 की सामान्य शÎ, सिजसमें यह उपबन् विकया गया है विक जहां कोई

मुकदमा समाप्त हो गया है या आदेश के ह खारिरज कर विदया गया र्थीा, उसी वाद

हेुक पर कोई नया वाद नहीं लाया जाएगा, टीपी अतिविनयम की ारा 60 की

विवभिशW श- को अभिभभावी नहीं कर सका है। एक विवशेर्ष कानून र्थीा जो विगरवी

रखने वाले और विगरवीदार के अतिकारों से संबंति र्थीा और वह मूल कानून

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

संपलिL हOांरण अतिविनयम में पाया जाना र्थीा। मूल कानून ने के वल दो रीके

प्रदान विकए सिजसमें मोचन का अतिकार समाप्त हो सका है और वे र्थीे:(i) पक्षकारों

के काय द्वारा या (ii) अदाल की तिडfी द्वारा। उन्मोचन का अतिकार एक जीविव

बंक की घटना है और यह ब क बना रहा है जब क विक बंक Oवयं मौजूद

रहा है।जैसा विक विप्रवी काउंसिसल द्वारा भैया रघुनार्थी सिंसह और अन्य बनाम

मुसम्म हंसराज कुं वर और अन्य (1933-34) 61 आइए 362 में

अभिभविनारिर विकया गया है, संपलिL हOांरण अतिविनयम की ारा 60 के

प्रावान के अनुसार उन्मोचन के अतिकार को समाप्त विकया जा सका है और

जब यह आरोप लगाया जाा है विक इसे एक तिडfी द्वारा समाप्त कर विदया गया है

ो तिडfी इस उद्देश्य के लिलए विनारिर प्रपत्र के अनुसार कड़ाई से चलनी चाविहए।

इस प्रकार जब क उन्मोचन की साम्या समाप्त नहीं हो जाी , ब क

बन्कका द्वारा उन्मोचन के लिलए दूसरा मुकदमा वर्जिज नहीं है, यविद परिरसीमा

की अवति के भीर दालिखल विकया गया हो।

62. इसलिलए, यविद उन्मोचन का अतिकार समाप्त नहीं होा है ो सीपीसी के

आदेश IX विनयम 9 जैसे प्रावान बन्नका को दूसरा मुकदमा दायर करने से

नहीं रोकें गे क्योंविक विकसी अलग वाद के रूप में उन्मोचन मुकदमे में वाद हेुक एक

पुनराव; होा है।जब क उन्मोचन का अतिकार समाप्त नहीं हो जाा या

उन्मोचन के लिलए कोई वाद समयबाति नहीं हो जाा, ब क प्रत्येक fविमक

काय में वाद हेुक अलग होा है।

63. परिरणामOवरूप यह अपील विवफल होी है और ख़ारिरज की जाी है।

64. इस न्यायालय द्वारा पारिर अंरिरम आदेश विदनांक 3.01.2019 में वाद

संख्या 154/2009 की आगे की कायवाही पर रोक लगा दी गई है, जो सिसविवल

न्यायाीश (जेडी) पूव;, सिजला बलिलया के न्यायालय में लंविब है।

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

65. विनचली अदाल अब वाद संख्या 154/2009 को सुनवाई के लिलए आगे

बढ़ाएगा और आज से छह महीने की अवति के भीर ज„द से ज„द उसका

विनOारण करेगा।यह OपW विकया जाा है विक दोनों पक्ष कानून के सभी दलीलों को

उठाने के लिलए Oवंत्र होंगे।

66. यह आगे OपW विकया जाा है विक हमने सिसविवल वाद की गुणों के संबं में कोई

राय व्यक्त नहीं की है।सिसविवल वाद का विनणय सख्ी से उन प्रमाणों में आार पर

विकया जाएगा सिजनका नेृत्व पक्षकारों द्वारा कानून में अनुसार विकया जा सका है।

67. हमने वमान अपील में अपने विनणय को के वल सीविम प्रश्न क ही सीविम

रखा है विक क्या वाविदयों को अभिभयोग में सुार करने की अनुमति दी जानी चाविहए

और दूसरा, क्या सीपीसी के आदेश IX विनयम 9 के प्रावान मौजूदा मामले पर

लागू होे हैं।

68. लाग के बारे में कोई आदेश नहीं होगा।

69. लंविब आवेदन (ओं), यविद कोई हो, विनOारिर विकया जाा है।

....................…

(न्यायमूर्ति सुांशु ूलिलया)

....................…

(न्यायमूर्ति जे. बी. परदीवाला)

नई विद~ी ;

14 माच, 2023

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

Advocates:
RAJEEV MAHESHWARANAND ROY

Judgement Key Points

Key Points: - (!) - (!) - (!) - (!) - (!) - (!) - (!) - (!) - (!) - (!)

What is the effect of the Civil Procedure Code IX Rule 9 on consolidation and initiation of new suits in the same litigation context?

What is the proper interpretation of the concept of "same suit" (same cause of action) for permitting or denying amendments or new proceedings under Section 83/TP (TP Ativanayam) and related amendments?

What are the standards for granting or denying amendments or substitutions in appellate proceedings under Civil Procedure Code, Rule 17, to avoid prejudice to the opposite party while ensuring substantial justice?


प्रतिवेद्य

भारीय सवच्च न्यायालय

सिसविवल अपीलीय अतिकारिरा

सिसविवल अपील सं. ................वर्ष 2023

(@ विव.अ.या. (सी) संख्या 28377 वर्ष 2018)

गणेश प्रसाद

.... अपीलका (गण)

बनाम

राजेश्वर प्रसाद एवं अन्य

...प्रतिवादी (गण)

विनणय

न्यायमूर्ति जे

. बी . पारदीवाला

1.

अनुमति प्रदान की गई।

2.

सुविवा के लिलए, इस वाद के अपीलार्थी; को 'मूल प्रतिवादी या प्रतिवादी' के

रूप में संदर्भिभ विकया जाएगा और प्रत्यर्थी;गण को 'मूल वादी या वादी' के रूप में

संदर्भिभ विकया जाएगा।

3.

यह अपील, वाद संख्या 154 वर्ष 2009 के मूल प्रतिवादी की ओर से,

जो वादी गण द्वारा सिसविवल जज (जे.डी.), पूव;, सिजला बलिलया की अदाल में

बंक के उन्मोचन उपरां वाद संपलिL के कब्जे के लिलए संस्थिOर्थी विकया गया र्थीा,

विवविव प्रकीण रिरट यातिचका 1346 वर्ष 2015 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा

पारिर 04.07.2018 विदनांविक आदेश के विवरुद्ध की गई है सिजसमें, अपर सिजला

जज द्वारा पारिर 25.02.2015 विदनांविक आदेश की अभिभपुविW की गई र्थीी सिजसके

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

द्वारा वादी गण को सिसविवल प्रविfया संविहा, 1908 (संक्षेप में सिस.प्र.सं.) के आदेश

VI विनयम 17 के प्रावानों के ह वाद पत्र को संशोति करने की अनुमति दी

गई र्थीी।

थ्यात्मक आार

4.

सिसविवल वाद की विवर्षयवOु ब्लॉक संख्या 2-5, ए संख्या 25, 26, 27,

28, 29 चौक, बलिलया सिसटी, परगना व सिजला बलिलया में स्थिOर्थी दुकान है। वादी

वाद संपलिL के वै मालिलक होने का दावा करे हैं। प्रतिवादी का पक्ष यह है विक

वादीगण के विपा ने ऊपर वर्भिण वाद संपलिL के 1/3 विहOसे के संबं में प्रतिवादी

के विपा के पक्ष में एक बंक विवलेख विनष्पाविद विकया र्थीा और दुकान का कब्जा

विदया र्थीा। इस प्रकार, प्रतिवादी के अनुसार, वादीगण का विपा बन्कका र्थीे और

उसका विपा बन्कग्रहीा र्थीा। उक्त पंजीकृ बंक विवलेख 12.02.1957 को

विनष्पाविद होना अभिभकभिर्थी है।

5.

1957 से 2005 क, बन्कग्रहीा के पास वाद संपलिL का कब्जा रहा

क्योंविक न ो बन्क न का भुगान विकया गया और न ही बंक को छु ड़ाया गया

र्थीा और 30 साल की समयावति के बाद, बंक संपलिL में बन्कका का

अतिकार परिरसीमन अतिविनयम, 1963 (संक्षेप में, 'अतिविनयम, 1963') की

अनुसूची के अनुच्छेद 61 ए के अीन समाप्त हो गया र्थीा। वर्ष 2005 में प्रतिवादी

के विपा यानी बन्कग्रहीा, अर्थीा् श्री गुलाब चंद की मृत्यु हो गई।

6.

15.03.2007 को, वादी ने वमान मामले के अपीलार्थी; प्रतिवादी एवं चार

अन्य के विवरुद्ध लघु वाद न्यायाीश (वरिरष्ठ प्रभाग) के न्यायालय में इस घोर्षणा

के लिलए वाद सं. 3 वर्ष 2007 संस्थिOर्थी विकया विक वादी वाद संपलिL अर्थीा दुकान

उद् घोर्षणा

“क्षेत्रीय भार्षा में अनुवाविद विनणय वादी के अपनी भार्षा में समझने हेु विनब^ति प्रयोग के लिलए है और विकसी अन्य

उद्देश्य के लिलए प्रयोग नहीं विकया जा सका है। सभी व्यावहारिरक और सरकारी उद्देश्यों के लिलए, विनणय का अंग्रेजी

संOकरण प्रामाभिणक माना जाएगा र्थीा विनष्पादन और विfयान्वयन के उद्देश्यों के लिलए मान्य होगा।"

के वै Oवामी हैं और उसे वमान मामले के अपीलार्थी; प्रतिवादी के विपा को

विकराए पर विदया गया र्थीा और प्रतिवादी के विपा के विनन के बाद, उन्होंने वादी

को विकराए का भुगान बंद कर विदया और अवै रूप से प्रतिवादी संख्या 2 से 5

को संबंति दुकान में उप-विकराएदार के रूप में शाविमल कर लिलया। इस प्रकार,

वादीगण ने दुकान के कब्जे की तिडfी के लिलए प्रार्थीना की।

7. वादीगण द्वारा संस्थिOर्थी लघु वाद सं. 3 वर्ष 2007 में विनम्नलिललिख अनुोर्ष के

लिलए प्रार्थीना की गई र्थीी:

"क. वादीगण के पक्ष में , प्रतिवादीगण के विवरद्ध उक्त दुकान यर्थीा

उसि~लिख परिरसर से बेदखली का आदेश, जैसा विक प्रतिवादी के लिखलाफ

वादी के पक्ष में सीमा के नीचे विवOार से विदया गया है , पारिर विकया

जाए, और यविद वे न्यायालय द्वारा आदेभिश अवति के भीर खाली नहीं

करे हैं ो इसे न्यायालय के माध्यम से खाली कराया जाए और इसका

कब्जा हम वादीगण को विदया जाए।

ख. प्रतिवादीगण के विवरुद्ध और वादीगण के पक्ष में 4500/- रुपये के

भुगान के लिलए तिडfी

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