2025 Supreme(Online)(SCDRC) 4935
STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION
U P P C L – Appellant
Versus
Sarvjeet Singh – Respondent
SC/9/A/2014/604
STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION UTTAR PRADESH FIRST APPEAL NO. SC/9/A/2014/604 null U P P C L PRESENT ADDRESS - aNCDRC,UTTAR PRADESH.
.......Appellant(s)
Versus Sarvjeet Singh PRESENT ADDRESS - aNCDRC,UTTAR PRADESH.
.......Respondent(s)
BEFORE:
HON'BLE MR. VIKAS SAXENA , JUDICIAL MEMBER HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY , MEMBER FOR THE APPELLANT:
U P P C L, In-Person FOR THE RESPONDENT:
Sarvjeet Singh, In-Person DATED: 28/02/2025
ORDER
( )
सुरक्षित , , राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग उ0प्र0 लखनऊ अपील सं0- 604/2014 , (जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग उन्नाव द्वारा परिवाद सं0- 15/2013 में पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 28.12.2013 के विरुद्ध)
1. Executive Engineer, Vidyut Vitran Khand II, Near Gokul Baba Mandir, Magarwara, Unnao.
2. Uttar Pradesh Power Corporation Nigam Ltd., 14, Ashok Marg, Shakti Bhawan, Lucknow through Managing Director.
3. Madhyanchal Vidyut Vitran Nigam Ltd., 4-A, Gokhaley Marg, Lucknow through Managing Director.
…….Appellants Versus Sarvjeet Singh, son of Sri Shivnath, resident of Village Mohaan Khurd, Tehsil Hasanganj, District Unnao.
………..Respondent समक्ष:-
1. मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य।
2. मा0 श्रीमती सुधा उपाध्याय, सदस्य। , अपीलार्थीगण की ओर से उपस्थित : श्री दीपक मेहरोत्रा
विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : कोई नहीं।
दिनांक:- 28.02.2025 , माननीय श्री विकास सक्सेना सदस्य द्वारा उद्घोषित निर्णय , परिवाद सं0- 15/2013 सर्वजीत सिंह बनाम अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खण्ड द्वितीय , व दो अन्य में जिला उपभोक्ता आयोग उन्नाव द्वारा पारित निर्णय व आदेश दि0 28.12.2013 के विरुद्ध यह अपील राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने प्रश्नगत निर्णय व आदेश के माध्यम से परिवाद स्वीकार करते हुये
निम्नलिखित आदेश पारित किया है:-
‘’
परिवाद एतदद्वारा स्वीकार किया जाता है तथा विपक्षी संख्या– 2 को निर्देशित किया
जाता है कि वे परिवादी से प्राप्त अधिक धनराशि
13500-7953=5547/-रू0 तथा विद्युत संयोजन हेतु प्राप्त धनराशि 550/-रू0 कुल धनराशि मु0 रूपये 6097/- (छ: हजार सत्तानवे रूपये) परिवादी को दिनांक 28.02.2013 के
बाद की अवधि में दिये जाने वाले बिलों में समायोजित करें और तदनुसार बिल दें।
विपक्षी संख्या- 2 परिवादी को क्षतिपूर्ति के रूप में
25,000/-रूपये (पच्चीस हजार रूपये) की राशि व परिवाद व्यय के रूप में
3,000/-रूपये
(तीन हजार रूपये) की राशि अदा
करेगा।‘’
प्रत्यर्थी/परिवादी ने इन अभिकथनों के साथ परिवाद प्रस्तुत किया कि , प्रत्यर्थी/परिवादी व्यावसायिक विद्युत कनेक्शन सं0- 081747 बुक सं0- 327 तथा खण्ड सं0- 406 (बादहूं 386) भार एक किलोवाट का अपीलार्थीगण/विपक्षीगण का उपभोक्ता है और उसने उक्त , कनेक्शन स्वरोजगार व जीविकोपार्जन हेतु लिया है। प्रत्यर्थी/परिवादी को कभी नियमित बिल नहीं भेजे गये बल्कि कनेक्शन स्वीकृति के समय से ही गलत राशि के बिल भेजे जाते रहे, जब कि प्रत्यर्थी/परिवादी बराबर बिल जमा करता रहा और अपीलार्थी/विपक्षी के अधिकारियों द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी पर दबाव बनाया जाने लगा, जिसे न मानने पर बिल भेजना बन्द कर दिया गया। प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा जमा धनराशि समायोजित नहीं की गई। दि0 16.11.2012 के बिल में 19,830/-रू0 की राशि बकाया दिखायी गई है जो किसी भी प्रकार देय नहीं है और मीटर रीडिंग के अनुसार बिल नहीं दिये गये हैं, जिससे व्यथित होकर परिवाद प्रस्तुत किया गया है।
अपीलार्थीगण/विपक्षी द्वारा प्रतिवाद पत्र में कथन किया गया है कि
प्रत्यर्थी/परिवादी के सभी जमा बिल का समायोजन समय-समय पर किया जाता रहा है। माह नवम्बर, 2012 तक के संशोधित बिल 7,953/-रू0 है। प्रत्यर्थी/परिवादी की सभी समस्याओं का
निस्तारण कर दिया गया। परिवाद खारिज किये जाने की प्रार्थना की गई है।
अपील में प्रश्नगत निर्णय को पूर्णतया अवैध एवं मनमाना बताया गया। अपील के मेमो के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी वर्षों से अवैध रूप से विद्युत का उपभोग कर रहा था। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने वर्ष 2003-04 के बिलों को अनदेखा करते हुये सीधे नवम्बर 2012 के
बिल की धनराशि 9,830/-रू0 का उल्लेख कर दिया है। प्रत्यर्थी/परिवादी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि किस कारण उसने वर्ष 2003 के उपरांत के बिलों का भुगतान नहीं किया। प्रत्यर्थी/परिवादी ने स्वयं स्वीकार किया है कि मार्च 2009 से उसने बिलों का भुगतान नहीं किया है तथा इसके उपरांत सीधे वर्ष 2013 के बिलों के लिये परिवाद देरी से प्रस्तुत किया है जिसका कोई औचित्य नहीं है। प्रत्यर्थी/पर