STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION
Sunita Yadav, President, Monika Malik, Member
Regional Manager, Punjab National Bank – Appellant
Versus
Sangeeta Dharwa – Respondent
प्रथम अपील क्रमांक-2014/2016
आदेश
(दिनांक 26/03/2026 को पारित)
माननीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुनीता यादव अनुसार :-
1- यह अपील उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 15 के अंतर्गत जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उज्जैन (संक्षेप में "जिला आयोग") के प्रकरण क्रमांक-307/2013 में पारित आदेश दिनांक 10/11/2016 से व्यथित होकर प्रस्तुत की गई है।
2- परिवादी द्वारा संक्षिप्त में परिवाद इस आशय का प्रस्तुत किया गया है कि उसने डेयरी व्यवसाय हेतु विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 से 9,50,000/- रूपए का ऋण प्राप्त किया था, जिस पर विपक्षी क्रमांक-4 द्वारा गारन्टी दी गई थी। उक्त ऋण स्वीकृत किये गये टर्न लोन एकाउंट नम्बर-11337 एवं वर्किंग केपीटल टर्म लोन एकाउंट नम्बर-11346 में परिवादी द्वारा किये गये 3 लाख रूपए की एफडीआर लोन स्वीकृत होने के 2 वर्ष बाद मार्जिन मनी के रूप में स्वीकृत होना था। खादी तथा ग्रामोद्योग कमीशन द्वारा विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 को माह 10 जुलाई, 2002 को आदेश दिया कि 2,77,917/- रूपए की राशि जमा करे किन्तु विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 द्वारा दिनांक 7 जुलाई, 2003 को लगभग 1 वर्ष पश्चात् खाते में क्रेडिट की गई। विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 द्वारा परिवादी व विपक्षी क्रमांक-4 को दिनांक 27 अप्रैल 2004 को पत्र प्रेषित कर सौम्य डेयरी के टर्म लोन एकाउंट नम्बर 11337 और वर्किंग केपीटल टर्म लोन एकाउंट नम्बर 11346 के सम्बन्ध में दायित्वों का निर्वहन न करने की घोषणा करते हुए 5,78,547/- में की मांग की गई। इस सम्बन्ध में परिवादी एवं विपक्षी क्रमांक-4 द्वारा एक द्वितीय अपील क्रमांक 8/2005 डेट रिकव्हरी ट्रिब्यूनल, जबलपुर के समक्ष प्रस्तुत किया जो विचाराधीन रहते ही अपर तहसीलदार उज्जैन द्वारा विपक्षी क्रमांक-4 के नाम 42 स्थित एसबीआई कॉलोनी सुभाष नगर, उज्जैन को दिनांक 18 मार्च 2008 को नीलाम करने हेतु आदेशित कर दिया।
3- परिवाद में यह भी अभिकथित किया है कि उपरोक्त आदेश के विरुद्ध परिवादी एवं विपक्षी क्रमांक-4 द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, खण्डपीठ, इन्दौर के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत की गई, जिस पर विपक्षी क्रमांक-4 को विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 के पास 5 लाख जमा करने का आदेश दिया, जिसे जमा करा दी गई। डेट रिकव्हरी ट्रिब्यूनल, जबलपुर द्वारा दिनांक 6 अगस्त, 2010 को पारित आदेश द्वारा अपील क्रमांक-8/2005 को निरस्त कर दिया गया, जिसके विरुद्ध परिवादी एवं विपक्षी क्रमांक-4 द्वारा डेट रिकव्हरी अपीलेट ट्रिब्यूनल, इलाहाबाद के समक्ष अपील क्रमांक-1223/2010 प्रस्तुत की गई तो आउट स्टैंडिंग बैलेंस 5,78,547/- रूपए का 40 प्रतिशत राशि विपक्षी क्र. 1 लगायत 3 के यहां जमा करने के निर्देश दिये गये। परिवादी ने डिमांड ड्राफ्ट क्रमांक 008947 के द्वारा 1,44,637/- रूपए दिनांक 27 जनवरी 2011 को डेट रिकव्हरी अपीलेट ट्रिब्यूनल, इलाहाबाद में जमा कराई।
4- परिवाद में यह भी अभिकथित किया है कि परिवादी को जानकारी हुई कि विपक्षी क्रमांक-4 एवं विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 के मध्य दिनांक 11 जुलाई 2011 को आपसी समझौता हो गया है, जिसमें विपक्षी क्रमांक-4 द्वारा परिवादी की सहमति के बिना दिनांक 12 मई, 2011 को 5,25,000/- रूपए का प्रस्ताव मेसर्स सौम्या डेयरी के विरुद्ध चुकाने हेतु दिया गया है और परिवादी द्वारा भी डिमांड ड्राफ्ट क्रमांक-008947 दिनांक 11 अप्रैल 2011 मूल्य 86,782/- रूपए की राशि दिनांक 17 अगस्त 2011 को जमा करा दी। इस प्रकार विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 द्वारा समझौता होने के पश्चात् भी परिवादी से 86,782/- रूपए की राशि अतिरिक्त रूप से प्राप्त कर ली गई है। अतः विपक्षीगण से परिवाद पत्र में चाहा गया वांछित अनुतोष दिलाया जावे।
5- विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 की ओर से परिवाद का लिखित जवाब संक्षेप में इस आशय का प्रस्तुत किया गया है कि परिवादी द्वारा नियत समयावधि में ईकाई चालू नहीं की थी एवं खादी ग्रामोद्योग का निरीक्षण करने पर बंद पायी गयी थी। अतएव खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा दी गई संतुष्टि पर ही मार्जिन मनी परिवादी के खाते में जमा की गई। परिवादी द्वारा अपने खाते का संचालन सुचारू रूप से नहीं किया जा रहा था, इस सम्बन्ध में गारन्टर विपक्षी क्रमांक-4 को भी सूचना पत्र दिया गया था। माननीय उच्च न्यायालय खण्डपीठ, इलाहाबाद के आदेशानुसार 5 लाख रूपए विपक्षी क्रमांक-1 लगायत 3 को जमा ही नहीं करवाई गई। डेट अपीलेट ट्रिब्यूनल, इलाहाबाद के समक्ष समझौता दिनांक 11 जुलाई 2011 की जानकारी देने की आवश्यकता इसलिए नहीं थी क्योंकि समझौते के पूर्व दिनांक 29 मार्च 2011 को ही अपील माननीय अपीलेट ट्रिब्यूनल के समक्ष निरस्त हो चुकी थी। परिवादी के खाते में वन टाईम सेटलमेंट के अन्तर्गत समझौता हुआ है, जिसमें उन्हें परिवादी से बहुत कम राशि प्राप्त हुई है। कथित 86
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