STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION
Devendra Kachhwaha, President
AU Financers (India) Limited – Appellant
Versus
Kailash Chandra – Respondent
Review Petition No. 11 / 2023
| Table of Content |
|---|
| 1. procedural history of the dispute and filings. (Para 1 , 2 , 3) |
| 2. arguments presented by both parties regarding the review. (Para 4 , 5 , 6) |
| 3. limited scope of review jurisdiction and limitation bar. (Para 7 , 8 , 9 , 10) |
आदेश
1. उपरोक्त शीर्षक के अनुसार प्रार्थी/अपीलार्थी ने इस आयोग के निर्णय दिनांक 07.07.2023 के विरुद्ध यह पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र दिनांक 01.12.2023 को प्रस्तुत किया है, जिसके द्वारा प्रार्थी/अपीलार्थी ए.यू.फाईनेंसर्स (इण्डिया) लि. की अपील आंशिक रूप से स्वीकार की जाकर निम्नलिखित आदेश पारित किया गया :-
1. विद्वान जिला आयोग द्वारा परिवादी को दिलवायी गयी ऋण राशि 60,000/- रुपये के बाबत दिया गया आदेश अपास्त किया जाता है ।
2. इसी प्रकार विद्वान जिला आयोग द्वारा आर्थिक क्षति के पेटे 50,000/-रुपये के स्थान पर प्रत्यर्थी/परिवादी 20,000/-रुपये प्राप्त, मानसिक क्षति पेटे 20,000/-रुपये के स्थान पर 10,000/-रुपये तथा परिवाद व्यय पेटे 5,000/-रुपये प्रत्यर्थी/परिवादी, अपीलान्ट/विपक्षी से प्राप्त करने का अधिकारी होगा ।
3. इसी प्रकार अपीलान्ट/विपक्षी वाहन को चालू कण्डीशन में पांचों टायर्स व बैटरी नई लगवाकर चालू कण्डीशन में प्राप्त करने का अधिकारी होगा, जिसके लिए अपीलान्ट/विपक्षी ऑथोराईज सर्विस सेंटर अथवा स्थानीय पुलिस विभाग के एमटीओ से प्रमाणपत्र वाहन सुपुर्दगी के समय संलग्न करेगा ।
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2. प्रकरण के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार से है कि प्रार्थी/अपीलार्थी ए.यू.फाईनेंसर्स (इण्डिया) लिमिटेड, ने एक अपील जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग बाड़मेर द्वारा परिवाद संख्या 210/2016 में पारित निर्णय दिनांक 22.11.2017 से व्यथित होकर प्रस्तुत की थी । अपीलार्थी की अपील संख्या 204/2017 को इस राज्य आयोग द्वारा आंशिक रूप से स्वीकार किया जाकर उपरोक्तनुसार निर्णय दिनांक 07.07.2023 पारित किया ।
3. प्रार्थी/अपीलार्थी द्वारा अपील संख्या 204/2017 में पारित निर्णय दिनांक 07.07.2023 को माननीय राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, नई दिल्ली के समक्ष पुनरावलोकन याचिका संख्या 2541/2023 द्वारा चुनौती दी गयी परन्तु बाद में प्रार्थी ने उक्त निगरानी याचिका, पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र प्रस्तुत करने की छूट प्रदान करने की प्रार्थना करते हुए विड्रॉ कर ली । तत्पश्चात मौजूदा पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र आक्षेपित आदेश दिनांक 07.07.2023 के विरुद्ध प्रस्तुत किया गया है ।
4. उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्तागण की बहस सुनी गयी ।
5. विद्वान अधिवक्ता प्रार्थी/अपीलार्थी ने पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र में अंकित तथ्यों को दोहराते हुए तर्क दिया कि पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र में उल्लेखित आधारों को ही प्रार्थी/अपीलार्थी के तर्क माने जावे । अंतः में प्रार्थी/अपीलार्थी की ओर से पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र स्वीकार करने एवं माननीय राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा अपील संख्या 204/2017 में पारित निर्णय दिनांक 07.07.2023 अपास्त किये जाने की प्रार्थना की गयी ।
6. इसके विपरीत विद्वान अधिवक्ता अप्रार्थी/प्रत्यर्थी की ओर से प्रार्थी/अपीलार्थी के तर्कों का विरोध करते हुए तर्क दिया गया कि आज दिन तक गाड़ी प्रार्थी/अपीलार्थी के पास ही है । माननीय राज्य उपभोक्ता आयोग ने विधि सम्मत निर्णय पारित किया है, जिसमें हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है । अतः प्रार्थी/अपीलार्थी का पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र अस्वीकार किया जावे ।
7. हमने विद्वान अधिवक्ता प्रार्थी/अपीलार्थी एवं अप्रार्थी/प्रत्यर्थी के तर्कों पर मनन किया तथा अपील संख्या 204/2017 में पारित निर्णय दिनांक 07.07.2023 एवं पत्रावली का अवलोकन किया गया ।
8. स्वीकृत रूप से परिवादी/प्रार्थी के परिवाद को स्वीकार करने का जो आदेश जिला उपभोक्ता आयोग बाड़मेर (राजस्थान) द्वारा परिवाद संख्या 210/2016 में दिनांक 22.11.2017 को पारित किया गया था, उसके विरुद्ध अप्रार्थी ए.यू.फाईनेंस (इण्डिया) लिमिटेड द्वारा अपील संख्या 204/2017 इस आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गयी । उक्त अपील आक्षेपित निर्णय दिनांक 07.07.2023 के माध्यम से इस आयोग द्वारा आंशिक रूप से स्वीकार की गयी है जिससे व्यथित होकर निगरानीकर्ता/अप्रार्थी ने माननीय राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत की थी जिसका क्षेत्राधिकार निर्विवादित रूप से मौजूदा पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र से अधिक विस्तृत है । बावजूद इसके प्रार्थी/अपीलार्थी ने उक्त निगरानी याचिका को विड्रा करते हुए मौजूदा पुनरावलोकन प्रार्थनापत्र प्रस्तुत करने का चयन किया है । यह भी विधि का सर्वमान्य सिद्धांत है कि धारा-50 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में इस आयोग के क्षेत्राधिकार बहुत सीमित है । केवल ऐसी त्र
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