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2026 Supreme(Online)(SCDRC) 3532

STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION
श्री मुकेश, पीठासीन सदस्य, श्री लियाकत अली, सदस्य
SURESH CHAND BHARGAV – Appellant
Versus
STATE BANK OF INDIA – Respondent
SC/CB1/8/A/74/2024



Petitioner Advocates:JOG SINGH BHATI 9828046922 ,Respondent Advocate:

A consumer complaint regarding a joint fixed deposit is not maintainable unless filed jointly by all account holders as per the provisions of the Consumer Protection Act.

Headnote:The case concerns an appeal filed against the order of the District Consumer Commission regarding the release of maturity proceeds of a fixed deposit and the freezing of bank accounts. The appellant challenged the commission's refusal to entertain the complaint filed solely by him regarding a joint fixed deposit. The court observed that under the Consumer Protection Act, specifically referencing S. 2(5)(v) and S. 35(11), a single party cannot maintain a complaint for a joint deposit without the second holder. The core issues framed involved the maintainability of the complaint for a joint account and the conditions for unlocking the bank accounts. The court reasoned that while the appellant is entitled to the proceeds under certain conditions, he must file a joint complaint with the co-holder to satisfy the statutory requirements of the Act. The appeal is partially allowed, directing the bank to release funds upon the submission of a bank guarantee and granting the appellant the liberty to file a joint complaint with his spouse for the remaining claims, while upholding the penalty imposed on the bank.

Table of Content
1. conditional release of funds based on bank guarantee. (Para 1 , 2 , 6)
2. requirement for filing joint complaints in joint account matters. (Para 3)
3. compensation and compliance timelines for bank defaults. (Para 4 , 5 , 7 , 8)

1. अतः अपीलार्थी सुरेश चंद भार्गव की ओर से प्रस्तुत अपील आंशिक रूप से स्वीकार की जाकर विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित आदेश 'परिवादी को 1,00,000/- रूपये (एक लाख रूपये) की सावधि जमा की परिपक्वता राशि में से अंतरिम आदेशानुसार 75,000 रूपये (पिचहतर हजार रूपये) को उपान्तरित करते हुए प्रत्यर्थी को आदेश दिया जाता है कि 58,000/- रूपये पर दिनांक 11.11.2017 से आज दिनांक यदि कोई ब्याज परिवादी के खाते में जोड़ा गया है तो । उस उस ब्याज ब्याज राशि र सहित कुल राशि के बराबर एक साल की बैंक गारण्टी परिवादी द्वारा प्रत्यर्थी बैंक में पेश किये जाने की स्थिति में उक्त समस्त देय राशि परिवादी को अदा करे । । बैंक गारण्टी केवल एक साल तक प्रभावी रहेगी । इस अवधि में प्रत्यर्थी बैंक को सक्षम प्राधिकारी अथवा सक्षम न्यायालय द्वारा परिवादी के खाते में 58,000/- रूपये और उस पर दिनांक 11.11.2017 से देय ब्याज के संबंध में कोई आदेश पारित किया जाता है तो उस आदेश के अनुसार 58,000/- रूपये व्याज राशि के संबंध में प्रत्यर्थी बैंक आदेश पारित करने/कार्यवाही करने को स्वतंत्र होगी। यदि एक साल की समयावधि गुजर जाने के पश्चात भी प्रत्यर्थी बैंक को सक्षम प्राधिकारी अथवा सक्षम न्यायालय द्वारा 58,000 /- रूपये और उस पर देय ब्याज के संबंध में कोई आदेश पारित, प्राप्त नहीं होता है तो परिवादी, बैंक गारण्टी को वापिस प्राप्त करने का हकदार होगा। यह स्पष्ट किया जाता है कि इस आदेश के होते हुए भी प्रत्यर्थी बैंक. दिव्या फॉर्मेसी, मोहित मित्तल लाबसोल इण्डिया को चैक संख्या 834993 के संबंध में नियमानुसार विधिक कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होंगे और इस संबंध में सक्षम न्यायालय का आदेश इस आदेश पर अधिभावी प्रभाव रखेगा ।

2. यह भी आदेश पारित किया जाता है कि अपीलार्थी/ परिवादी यदि आदेशानुसार बैंक गारण्टी पेश कर देता है तो परिवादी के प्रत्यर्थी बैंक में धारित सभी खाते Mat चैक संख्या 834993 के संबंध में फ्री होल्ड माने जावेंगे ।

3. अपीलार्थी/ परिवादी का परिवाद संयुक्त एफ.डी. के संबंध में खारिज किया गया है इस संबंध में अपील की कंडिका संख्या-7 में चुनौती दी है परन्तु यह नहीं बताया गया है कि संयुक्त एफ.डी. को परिवादी व्यक्तिगत रूप से अकेले किस प्रावधान में परिवाद पेश कर सकता है। धारा 2 (5) (v) सपठित धारा 35 (11) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार भी परिवाद नहीं है। अतः विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग के द्वारा पारित आदेश को इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि परिवादी अपनी पत्नी के साथ मिलकर संयुक्त परिवाद (Joint complaint) पेश करने को स्वतंत्र है।

4. भारतीय स्टेट बैंक पीपाड़ सिटी पर 25,000/- रूपये का जुर्माना लगाया गया है और उसे राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष जयपुर में जमा कराने को आदेशित किया गया है। विद्वान जिला उपभोक्ता द्वारा पारित आदेश के संबंध में बैंक द्वारा कोई अपील नहीं की गयी है। ऐसी स्थिति में उक्त आदेश को पुष्ट किया जाता है।

5. प्रत्यर्थी को आदेश दिया जाता है कि, अपीलार्थी/ परिवादी को बतौर क्षतिपूर्ति 10,000/- रूपये (अक्षरे दस हजार रूपये) एवं बतौर दस हजार परिवाद व्यय 5000/- रूपये अदा करने का आदेश दिया जाता है

6. 75.000 /- रूपये (अक्षरे पिचत्तहर हजार रूपये) की जो राशि होल्ड रही है, उस पर दिनांक 17.11.2011 से अदायगी तक नियमानुसार जो भी बैंक ब्याज है, वह परिवादी प्राप्त करने का हकदार होगा ।

7. उपरोक्त आदेश की पालना इस निर्णय की दिनांक से 30 (तीस) दिन में की जावे।

8. नियमानुसार निर्णय की एक प्रति के साथ विद्धान जिला उपभोक्ता आयोग का मूल अभिलेख अविलंब लौटाया जाये।

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