PARAMEDICAL COUNCIL ACT
अधिनियम सं० 06 वर्ष 2009
20 जुलाई, 2009
“भारत का संविधान” के अनुच्छेद 200 के अधीन राज्यपाल महोदय ने उत्तराखण्ड विधान सभा द्वारा पारित उत्तराखण्ड परा चिकित्सा परिषद् विधेयक, 2009 को दिनांक 17 जुलाई, 2009 को अनुमति प्रदान की और वह उत्तरांचल अधिनियम संख्या 06, वर्ष 2009 के रूप में सर्व-साधारण की सूचनार्थ इस अधिसूचना द्वारा प्रकाशित किया जाता है। परा चिकित्सा परिषद् के गठन, चिकित्सा की शिक्षा में समन्वित विकास के लिए ऐसी शिक्षा के मानकों को विनियमित करने और अनुशिक्षण करने की दृष्टि से परा चिकित्सकों का रजिस्टर रखने और उसमें संसक्त या आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिए अधिनियम भारत के गणराज्य के साठवें वर्ष में विधान सभा द्वारा निम्नलिखित रूप में अधिनियमित हो :–
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(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 2009 है।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण उत्तराखण्ड राज्य पर है।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे।
2. इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अपेक्षित न हो :–
(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद् का गठन करेगी।
(2) उत्तराखण्ड परा-चिकित्सा परिषद् एक निगमित निकाय होगी, जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उसको जंगम और स्थावर सम्पत्ति को अर्जित करने, धारित करने और उसका निपटारा करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी तथा वह उक्त नाम से वाद ला सकेगी या उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा।
(3) परिषद् का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा, जो राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा विनिश्चित किया जाए।
(4) परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी; अर्थात् :–
(1) परिषद् का कोई सदस्य, उसकी नियुक्ति की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए पदधारण करेगा।
(2) किसी सदस्य का पद रिक्त हुआ समझा जायेगा, यदि परिषद् की राय में वह परिषद् के तीन लगातार सामान्य बैठकों में बिना पयाप्त कारणों के अनुपस्थित रहा है या वह धारा 5 के अधीन सदस्य नहीं रह जाता है।
(3) परिषद् में कोई आकस्मिक रिक्ति नई नियुक्ति द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति को भरने के लिए इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति केवल उस सदस्य की शेष अवधि के लिए पद धारण करेगा, जिसके स्थान पर वह नियुक्त हुआ है।
(4) परिषद् का कोई सदस्य पुनः नियुक्ति का पात्र होगा।
(1) धारा 3 की उपधारा (4) के खण्ड (ग) से (ञ) तक के अधीन राज्य सरकार द्वारा नामित/नियुक्त कोई सदस्य उसकी उस सेवा समाप्त होने पर, जिसके कारण वह नियुक्त किया गया था, परिषद् का सदस्य नहीं रहेगा।
(2) धारा 3 की उपधारा (4) के खण्ड (ट) के अधीन निर्वाचित कोई सदस्य रजिस्टर से उसका नाम हटाए जाने पर परिषद् का सदस्य नहीं रहेगा।
6. सरकार द्वारा धारा 3 की उपधारा (4) के खण्ड (क), (ख) और (छ) से (ट) के अधीन नियुक्त कोई सदस्य राज्य सरकार को सम्बोधित लिखित रूप में अपने हस्ताक्षर से अपनी सदस्यता से किसी भी समय त्याग-पत्र दे सकेगा :
परन्तु यह कि ऐसा सदस्य, जिसने इस धारा के अधीन अपना त्याग-पत्र प्रस्तुत किया है, तब तक परिषद् का पद धारण करता रहेगा, जब तक राज्य सरकार द्वारा उसका त्याग-पत्र स्वीकार नहीं कर लिया जाता।
(1) परिषद् उपधारा (2) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उसके कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो तिहाई से अन्यून बहुमत द्वारा किसी समय राज्य सरकार को किसी सदस्य को उसके पद से हटाए जाने की सिफारिश कर सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किसी कारण से परिषद् में उस सदस्य का बना रहना लोक हित में नहीं है या उक्त व्यक्ति परिषद् के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और इस सम्बन्ध में राज्य सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा।
(2) राज्य सरकार, परिषद् के किसी सदस्य को हटा सकेगी, यदि वह–
(1) परिषद् की बैठक ऐसे समय और स्थान पर होगी और वह अपनी बैठकों के कारबार के संचालन के सम्बन्ध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का, जिसके अन्तर्गत बैठकों में गणपूर्ति भी है, अनुपालन करेगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाये :
परन्तु यह कि परिषद् एक वर्ष में न्यूनतम एक बार बैठक करेगी।
(2) परिषद् का अध्यक्ष बैठकों की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष अध्यक्षता करेगा।
(3) यदि किसी कारण से अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, परिषद् की किसी बैठक में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा निर्वाचित कोई अन्य सदस्य इस बैठक की अध्यक्षता करेगा।
(4) ऐसे सभी प्रश्न, जो परिषद् की किसी बैठक के समक्ष आते हैं, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा विनिश्चित किए जायेंगे और बराबर मत होने की दशा में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का द्वितीय और निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा।
9. परिषद् का कोई कार्य या कार्यवाई :–
(1) परिषद् की प्रत्येक बैठक का कार्यवृत्त गोपनीय होगा एवं कोई भी व्यक्ति परिषद् के पूर्व सकल्प के बिना बैठक की कार्यवाही अथवा उसके अंश को प्रकट नहीं करेगा :
परन्तु यह कि कोई व्यक्ति परिषद् की बैठक के उन निर्णयों को प्रकट अथवा प्रकाशित कर सकेगा, जिसके लिए परिषद् द्वारा सकल्प लिया जा चुका है एवं यदि परिषद् के किसी सकल्प द्वारा प्रकाशन को सर्वथा गोपनीय रखने का संकल्प न लिया गया हो।
(2) किसी भी व्यक्ति द्वारा परिषद की सदस्यता अथवा अध्यक्षता, उपाध्यक्षता अथवा किसी बैठक के पीठासीन अधिकारी की हैसियत से किए गए कार्य, उनके चुनाव अथवा नामांकन के दोष अथवा निरर्हता के कारण समाप्त नहीं होगी अथवा परिषद् के उन बैठकों की कार्यवाही, जिसमें उनके द्वारा अध्यक्षता की गई हो, भी वांछित नहीं होगी, यदि बैठक के निर्णय सदस्यों के बहुमत के आधार पर लिए गए हों।
(3) जब परिषद् का कोई पद रिक्त हो तो परिषद् के निर्वाचित सदस्य इस प्रकार कार्य करेंगे, जैसे कि वह रिक्ति घटित न हुई हो।
(4) परिषद् द्वारा किए गए किसी भी कार्य पर मात्र इस आशय से प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकेगा कि उसमें कोई रि
परिषद के सदस्यों को ऐसी यात्रा और अन्य भत्ते प्राप्त होंगे, जैसे कि विनियमों द्वारा विहित किए जाए :
परन्तु यह कि परिषद के सदस्य, जो सरकारी कर्मचारी हैं, ऐसे अन्य भत्ते प्राप्त करने के हकदार नहीं होंगे।
(1) परिषद्, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, अपने साथ ऐसे व्यक्ति को, जिसकी सहायता या सलाह, वह इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी को कार्यान्वित करने के लिए अपेक्षित समझे, सहयोगित कर सकेगी।
(2) किसी प्रयोजन के लिए उपधारा (1) के अधीन परिषद् के साथ सहयोगित कोई व्यक्ति उस प्रयोजन के लिए सुसंगत किसी चर्चा में भाग लेने का अधिकार रखेगा, किन्तु उसे परिषद् की किसी बैठक में मत देने का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा।
(3) सहयोगित व्यक्ति, ऐसे भत्ते प्राप्त करने के अधिकारी होंगे, जैसे विनियमों द्वारा अवधारित किए जायं।
(1) परिषद्, यथासम्भव शीघ्र अपने सदस्यों में ऐसे साधारण और विशिष्ट प्रयोजनों के लिए, जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक समझे, ऐसी कार्यपालक समिति, अनुशासन समिति या किसी अन्य समिति का गठन करेगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए।
(2) किसी समिति का गठन, कार्यकाल और कृत्य ऐसे होंगे, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं।
(3) इस धारा के अधीन गठित प्रत्येक समिति अपने अध्यक्ष का चयन करेगी; परन्तु यह कि –
(1) परिषद् का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी कार्यवाही करे, जो वह परा-चिकित्सा शिक्षा और मानकों के अनुश्रवण के समेकित और एकीकृत विकास को सुनिश्चित करने के लिए ठीक समझे।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना परिषद् के कृत्यों में निम्नलिखित होंगे :-
(1) इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए परिषद्, ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त बनाए जाए, एक सचिव/रजिस्ट्रार उतने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी, जो वह आवश्यक समझे :
परन्तु यह कि परिषद् का पहला सचिव/रजिस्ट्रार राज्य सरकार द्वारा, ऐसे निबन्धों और शर्तों पर नियुक्त किया जायेगा, जो राज्य सरकार ठीक समझे और वह ऐसा सचिव तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा।
(2) परिषद् द्वारा नियुक्त सचिव/रजिस्ट्रार, अधिकारी या अन्य कर्मचारी सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होंगे, जो ऐसे पारिश्रमिक के हकदार होंगे, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं।
(3) परिषद् द्वारा इस अधिनियम के अधीन तैनात किया गया रजिस्ट्रार या अन्य कोई अधिकारी या सेवक भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का सं0 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जायेंगे।
धारा 15 के उपधारा (1) के अधीन नियुक्त सचिव/रजिस्ट्रार परिषद् का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा।
सचिव/रजिस्ट्रार के कर्तव्य ऐसे होंगे, जैसे विनियमों में अवधारित किए जाये।
परिषद् के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष या इस निमित्त उक्त परिषद् द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जायेंगे और उक्त परिषद् द्वारा जारी सभी अन्य लिखतें मुख्य कार्यपालक अधिकारी या उक्त परिषद् के किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जायेंगी।
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी विश्वविद्यालय या संस्था को राज्य के अन्दर परा-चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी। राज्य सरकार ऐसी अनुमति ऐसे निबन्धनों के अधीन, जो वह आवश्यक समझे, दे सकेगी।
(1) सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् समय-समय पर अधिसूचना द्वारा, किसी विश्वविद्यालय या संस्था द्वारा अनुदत्त शिक्षा को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त अर्हता के रूप में घोषित कर सकेगी।
(2) ऐसा विश्वविद्यालय या संस्था, जिसकी शिक्षा उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित नहीं की गई है, राज्य सरकार को उसके विनिश्चय का पुनर्विलोकन करने के लिए आवेदन कर सकेगी :
परन्तु यह कि राज्य सरकार उपधारा (2) में दिए गए आवेदन को लेखबद्ध कारणों से नामंजूर कर सकेगी।
(3) राज्य सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् अधिसूचना द्वारा ऐसे व्यक्तियों के लिए परा-चिकित्सा शिक्षा में शिथिलता दे सकेगी, जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख को या उससे पहले परा-चिकित्सा व्यवसायी, जिसके अन्तर्गत व्यवसायिक चिकित्सक भी हैं, के रूप में व्यवसाय कर रहे हों।
परिषद्, विश्वविद्यालयों या संस्थाओं द्वारा मान्य अर्हताओं को अनुदत्त करने के लिए, विनियमों द्वारा अपेक्षित परा-चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम मानक अवधारित कर सकेगी।
परा-चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने वाला कोई विश्वविद्यालय या संस्था शिक्षा के मानक, पाठ्यक्रम की अवधि, परीक्षा की रीति और अन्य अर्हता शर्तों के, जिनकी परिषद् समय-समय पर अपेक्षा करे, संबंध में परिषद् को सूचना देगा।
(1) परिषद्, उतनी संख्या में निरीक्षकों की नियुक्ति कर सकेगी, जितनी वह किसी विश्वविद्यालय या संस्था में, उसकी परा-चिकित्सा शिक्षा की मान्यता के सम्बन्ध में ठीक समझे।
(2) निरीक्षक –
(3) उपधारा (2) के अधीन अपने कृत्यों का अनुपालन करते समय कोई निरीक्षक परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेगा किन्तु वह परा-चिकित्सा शिक्षा के मानकों की पर्याप्तता के सम्बन्ध में, जिसके अन्तर्गत कर्मचारियों, उपस्कर, आवास, प्रशिक्षण और ऐसी परा-चिकित्सा शिक्षा देने के लिए अन्य सुविधाएं है या प्रत्येक परीक्षा की अपर्याप्तता, जिसमें वह उपस्थित होता है या कोई विषय, जिसके सम्बन्ध में परिषद् उसे रिपोर
जहां परिषद् ने राज्य सरकार को यह रिपोर्ट दी है कि परा-चिकित्सा शिक्षा का कोई मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम या कोई अनुमोदित परीक्षा विनियमों के अनुरूप नहीं चल रही है, वहां राज्य सरकार सम्बद्ध विश्वविद्यालय या संस्था को, यथास्थिति, परा-चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम या परीक्षा को दी गई मान्यता को वापस लेने के प्रश्न पर विचार करने के अपने आशय की सूचना देगी और यथास्थिति, उक्त विश्वविद्यालय या संस्था ऐसी सूचना की प्राप्ति से तीन मास के भीतर राज्य सरकार को इस विषय में ऐसा अभ्यावेदन भेजेगी, जो वह उचित समझे। उक्त अभ्यावेदन पर राज्य सरकार विनिश्चय करेगी और उसका विनिश्चय अन्तिम होगा।
(1) परिषद्, एक रजिस्टर रखेगी और इसमें विनियमों द्वारा अवधारित रीति से परा-चिकित्सा व्यवसायियों के नाम दर्ज करेगी।
(2) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति, जो ऐसी परा-चिकित्सा शिक्षा रखता है, जो राज्य सरकार द्वारा धारा 20 के अधीन अधिसूचित की जाए, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने और उससे व्यवसाय प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का पात्र होगा।
(3) इस अधिनियम के अधीन कोई व्यक्ति, तब तक व्यवसाय करने का हकदार नहीं होगा, जब तक कि उसका नाम रजिस्टर में दर्ज न कर दिया गया हो :
परन्तु यह कि ऐसे किसी व्यक्ति का नाम, जो राज्य सरकार द्वारा धारा 20 के अधीन अधिसूचित रूप में परा-चिकित्सा शिक्षा रखता है, रजिस्टर में ऐसी अधिसूचना की तारीख से उसके किसी आवेदन का परिषद् द्वारा निपटान किए जाने तक रजिस्टर में दर्ज किया माना जाएगा, यदि उसने परिषद् को अपना नाम रजिस्टर में दर्ज कराने के लिए आवेदन ऐसी अधिसूचना के प्रवृत्त होने से छः माह के भीतर किया हो।
(4) ऐसा रजिस्टर, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (अधिनियम सं0 1 सन् 1872) के अधीन लोक दस्तावेज समझा जायेगा।
(1) परिषद् किसी भी व्यक्ति द्वारा ऐसी रीति से, ऐसी फीस के संदाय पर, जो दो हजार रुपये से अधिक न हो अथवा जैसा विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, किए गए आवेदन की प्राप्ति पर रजिस्टर में उसका नाम दर्ज कर सकेगी, यदि परिषद् का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति ऐसी परा-चिकित्सा शिक्षा रखता है।
(2) कोई व्यक्ति, जिसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया है, यथास्थिति, सम्बन्धित विषय का परा भौतिक, चिकित्सा व्यवसायी या आयुर्विज्ञान प्रयोगशाला तकनीशियन या विकिरण चिकित्सा तकनीशियन कहलाने का हकदार होगा या भविष्य में राज्य सरकार द्वारा अन्य विषयों को, जो राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा सम्मिलित करे।
(3) परिषद् किसी व्यक्ति का नाम रजिस्टर में दर्ज करने से लेखबद्ध कारणों और विनियमों द्वारा अवधारित रीति से इंकार कर सकेगी।
(1) परिषद् इस अधिनियम के अधीन विनियमों द्वारा व्यवसायों के लिए वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार तथा सदाचार संहिता के मानक अवधारित करेगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन परिषद् द्वारा बनाए गए विनियम यह विनिर्दिष्ट कर सकेंगे कि कौन से अधिकमण वृत्तिक अवचार का गठन करते हैं और ऐसे उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।
(3) परिषद्, किसी भी व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच के पश्चात्, यदि कोई हो, जो करना ठीक समझे, जहां उसका समाधान हो जाता है, किसी व्यक्ति का नाम धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन रखे गए रजिस्टर से आदेश द्वारा हटा सकेगी –
(1) जहां परिषद् की, किसी सूचना की प्राप्ति पर या उसे की गई किसी शिकायत पर प्रथम दृष्टया यह राय है कि कोई परा-चिकित्सक व्यवसायी किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी है, वहां परिषद् मामले को धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन गठित अनुशासन समिति को निर्दिष्ट करेगी और तदुपरान्त अनुशासन समिति ऐसी जांच ऐसी रीति से करेगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाये और ऐसी जांच के परिणाम की परिषद् को रिपोर्ट करेगी।
(2) यदि ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर परिषद् का यह निष्कर्ष है कि परा-चिकित्सा व्यवसायी किसी वृत्तिक या अन्य अवचार का दोषी नहीं है तो वह तदनुसार अपना निष्कर्ष उल्लिखित करेगी और यथास्थिति, कार्यवाही फाइल की जाए या शिकायत खारिज की जाए, के निर्देश देगी।
(3) यदि परिषद्, ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, यह पाती है कि यथास्थिति, कोई परा-चिकित्सा व्यवसायी अपनी किसी वृत्तिक प्रतिष्ठा में किसी अवचार का दोषी है या उसने वृत्तिक आचरण या शिष्टाचार या इस अधिनियम के अधीन विहित सदाचार संहिता के मानदण्डों का अधिक्रमण किया है, तो वह ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध धारा 27 की उपधारा (3) और (4) के उपबन्धों के अनुसार
परिषद्, किसी ऐसे व्यक्ति के नाम को, जिसका नाम धारा 27 की उपधारा (4) के अधीन रजिस्टर से स्थायी रूप से नहीं हटाया गया है, किसी आदेश द्वारा, ऐसी रीति से और दो हजार रुपये से अधिक की ऐसी फीस के संदाय पर तथा ऐसी शर्तों और अपेक्षाओं को पूरा करने के पश्चात्, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाये, रजिस्टर में पुनः दर्ज कर सकेगी।
(1) जहां इस अधिनियम के अधीन परिषद् ने :-
(ख) रजिस्टर में किसी व्यक्ति के नाम को हटाने का आदेश कर दिया है, वहां ऐसा व्यक्ति परिषद् के आदेश की प्राप्ति की तारीख से 30 दिन की उक्त अवधि के भीतर ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, राज्य सरकार को अपील कर सकेगा :
परन्तु यह कि राज्य सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति पर्याप्त कारणों से अपील फाइल नहीं कर सका तो 30 दिन की समाप्ति के पश्चात् भी ऐसी अपील ग्रहण कर सकेगी।
(2) राज्य सरकार, उपधारा (1) के अधीन की गई अपील का निपटारा, ऐसी प्रक्रिया के अनुसार करेगी, जो विहित की जाए।
(3) उपधारा (2) के अधीन राज्य सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा।
राज्य सरकार विहित द्वारा इस निमित्त किए गए सम्यक विनियोगों के पश्चात् परिषद् को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशियों का संदाय कर सकेगी, जो इस अधिनियम के अधीन परिषद् के कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक समझी जाए।
(1) परिषद् की अपनी स्वयं की निधि होगी और ऐसी सभी राशियां, जो उसे राज्य सरकार द्वारा समय–समय पर संदत्त की जाए तथा परिषद् की सभी प्राप्तियां (जिसके अन्तर्गत ऐसी धनराशि भी है, जिसे कोई अन्य प्राधिकारी अथवा कोई व्यक्ति, परिषद् को सौंप सकेगा) निधि में जमा की जायेंगी और परिषद् द्वारा सभी संदाय निधि से किए जाएंगे।
(2) निधि से सम्बन्धित सभी धन, ऐसे बैंकों में ऐसी रीति से, जो परिषद् द्वारा विनिश्चित किए जाए, राज्य सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए जमा किए जायेंगे और उनमें निहित किये जायेंगे।
(3) परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसी धनराशियां खर्च कर सकेंगी, जिन्हें वह उचित समझे और ऐसी धनराशियों को परिषद् की निधि में से संदेय व्यय माना जायेगा।
(1) परिषद् आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत बजट ऐसे प्ररूप में और प्रत्येक वर्ष ऐसे समय पर, जो विहित किया जाये, तैयार करेगी, जिसमें प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किये जायें।
(2) ऐसी बैठक, जिसमें बजट पारित किया गया हो, के पन्द्रह दिन के भीतर, राज्य सरकार को अग्रेषित किया जायेगा।
(3) यदि राज्य सरकार की यह राय हो कि उसका इस प्रकार अग्रेषित किए गए बजट के प्राविधान इस अधिनियम के प्रयोजन के कार्यान्वित करने के लिए पर्याप्त नहीं तो वह बजट को उसमें ऐसे उपान्तरण करने के लिए उपाय जैसे कि राज्य सरकार द्वारा सुझाए जाये, परिषद् को वापस कर देगी।
(4) परिषद् इस बात के लिए सक्षम होगी कि ऐसी धनराशि का, जो आवश्यक हो, एक शीर्ष से दूसरे शीर्षक और ऐसे शीर्षक और गौण शीर्षकों में पुनर्विनियोग करे।
(5) परिषद्, जैसा और जब अपेक्षित हो अनुपूरक बजट, ऐसे प्ररूप में और ऐसे दिनांक तक, जो विहित की जाये, पारित कर सकेगी और उपधारा (2), (3), (4) के उपबन्ध ऐसे अनुपूरक बजट में लागू होंगे।
परिषद्, प्रत्येक वर्ष में एक बार, ऐसे प्ररूप और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाये, वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसमें पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का सही और पूरा लेखा–जोखा दिया जायेगा तथा उसकी प्रतिया राज्य सरकार को अग्रेषित की जाएगी और सरकार उसको विधान सभा के समक्ष रखवायेगी।
(1) परिषद् अपने वार्षिक लेखा बंद करने के पश्चात, यथाशीघ्र, ऐसे प्ररूप में लेखाओं का विवरण तैयार करेगी और उसे महालेखाकार को ऐसी तारीख तक अग्रेषित करेगी, जो राज्य सरकार उत्तराखण्ड के महालेखाकार के परामर्श से विहित करे।
(2) परिषद् के लेखाओं की महालेखाकार द्वारा ऐसे समय पर और ऐसी रीति से, जिन्हें वह उचित समझे, संपरीक्षा कराई जायेगी।
(3) परिषद् द्वारा महालेखाकार या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित लेखे तथा उन पर संपरीक्षा रिपोर्ट राज्य सरकार को वार्षिक रूप में अग्रेषित की जायेगी, जिसे सरकार द्वारा विधान सभा के समक्ष रखा जायेगा।
कोई भी क्लीनिकल स्थापन, जैसे अस्पताल, नर्सिंग होम या स्वास्थ्य देखरेख से सम्बन्ध में अन्य संस्थाएं, किसी व्यक्ति को परा–चिकित्सा व्यवसायी के रूप में तभी नियुक्त करेंगी, जब उसका नाम परिषद् के रजिस्टर में दर्ज कर दिया गया हो।
परा–चिकित्सा व्यवसायी की रिपोर्ट तब तक वैध नहीं समझी जायेगी जब तक कि ऐसी रिपोर्ट को विषय विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा प्रतिहस्ताक्षर न कर दिया गया हो। परा–चिकित्सा व्यवसायी निजी व्यवसाय स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकेगा।
ऐसा कोई विश्वविद्यालय या संस्था का प्राधिकृत प्राधिकारी, जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम अथवा विनियमों के उल्लंघन में कार्य करेगा, वह दोनों में से किसी भी तरह के कारावास से, जिसकी न्यूनतम अवधि छ: माह तथा अधिकतम अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी तथा जुर्माने से, जो पांच लाख रुपये तक का हो सकेगा, से दण्डित किया जायेगा।
ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम इस अधिनियम के अधीन परिषद् के रजिस्टर में प्रविष्ट नहीं किया गया है या जिसका नाम प्रविष्ट किया नहीं समझा जाता है और वह, यथास्थिति, परा–चिकित्सा व्यवसायी के रूप में व्यवसाय कर रहा है, वह दोनों में से, किसी भी तरह के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी तथा जुर्माने से, जो बीस हजार रुपये तक का हो सकेगा, से दण्डित किया जायेगा।
कोई व्यक्ति –
(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान परिषद् के सचिव/रजिस्ट्रार द्वारा या परिषद् द्वारा इस निमित्त परिषद् द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा प्राधिकृत किया गया हो, लिखित में किए गए परिवाद पर संज्ञान करेगा, अन्यथा नहीं।
(2) प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के न्यायालय से निम्न श्रेणी का कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी भी दण्डनीय अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
(1) राज्य सरकार, समय–समय पर परिषद् को ऐसे निर्देश जारी कर सकेगी, जो सरकार की राय में इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति में और उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए सहायक है और वह परिषद् किन्हीं, ऐसे निर्देशों को कार्यान्वित करने के लिए आबद्ध होगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी निर्देशों में, कोई विनियम बनाने या पहले से बनाए गए किन्हीं विनियमों में संशोधन करने या उनको प्रतिसंहृत करने के लिए परिषद् को दिए गए निर्देश भी सम्मिलित है।
(3) यदि राज्य सरकार की राय में, परिषद् ने इस धारा के अधीन जारी किए गए निर्देशों को प्रभावी करने में लगातार व्यतिक्रम किया है तो राज्य सरकार, परिषद् को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए अवसर देने के पश्चात्, आदेश द्वारा परिषद् को विघटित कर सकेगी और उसके पश्चात् एक नई परिषद् का ऐसी तारीख से, जो सरकार द्वारा अधिसूचित की जाए, इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार गठन कर सकेगी।
(4) जहां राज्य सरकार उपधारा (3) के अधीन परिषद् का विघटन करने वाला कोई आदेश पारित करती है, वहां वह इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार परिषद् के गठन के लम्बित रहने तक किसी व्यवित या व्य
इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही या किए जाने के लिए आशयित किसी बात की बाबत कोई बात, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही राज्य सरकार, परिषद्, परिषद् के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य, सचिव या परिषद् के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी।
(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।
(2) विशिष्टतया पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा; अर्थात् :–
(1) परिषद्, राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन से इस अधिनियम के उपबन्धों को क्रियान्वित करने के लिए इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना से नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा; अर्थात् :–
इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम तथा विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र विधान सभा के समक्ष रखे जायेंगे।
(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राज्य सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो और जो इस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हो :
परन्तु यह कि ऐसा आदेश इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख से दो वर्ष के बाद जारी नहीं किया जा सकेगा।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा।
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