[BIHAR ACT 40 OF 1982]1
23-01-1982
An Act to provide for the Development of various regions of the State of Bihar according to plan and for matters ancillary thereto. Be it enacted by the Legislature of the State of Bihar in the twenty-eighth year of the Republic of India as follows: 1. Assented to by the President on 23-01-1982 and published in Bihar Gazette (ext-ord.) dated 25-1-1982.
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झारखंड सरकार,
नगर विकास, लोक निर्माण विभाग।
अधिसूचना
राँची, दिनांक - १५/२/२०००
अधिनियम, 2000 की धारा 85 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए झारखंड राज्य सरकार बिहार क्षेत्रीय विकास प्राधिकार अधिनियम, 1981 को इनके द्वारा यथा उल्लिखित अधिनियम के रूप में संदर्भित निम्नलिखित संशोधनों के राय अंगीकृत करती है :-
1. यथा उल्लिखित अधिनियम, 1981 की धारा-1(1) में अंकित "बिहार" शब्द को "झारखंड" शब्द से प्रतिस्थापित समझा जाय। झारखंड राज्य केवल में अग्रलिखित प्रयोजनों के लिए यह अधिनियम अब "झारखंड क्षेत्रीय विकास प्राधिकार अधिनियम 1981" समझा जायेगा।
2. यथा उल्लिखित अधिनियम, 1981 के अन्तर्गत जहाँ-जहाँ "बिहार" शब्द का उल्लेख किया गया है, वहाँ-वहाँ उसे "झारखंड" शब्द से प्रतिस्थापित समझा जायेगा।
झारखंड राज्यपाल के आदेश से,
सरकार के संपर्क सचिव
ज्ञापांक- ०८ /राँची, दिनांक- १५/२/२०००
प्रतिलिपि :- अधीक्षक, राजकीय मुद्रालय, राँची को गणत के आपार्थ अंक में प्रकाशनार्थ प्रेषित।
ज्ञापांक- ०८ /राँची, दिनांक- १५/२/२०००
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(1) The Authority may constitute Committee consisting wholly of members or wholly of other persons or partly of members and partly of other persons for such purpose or purposes as it may think fit.
(2) A Committee constituted under this section shall meet at such time and place and shall observe such rules or procedure in regard to the transaction of business at its meetings as may be determined by regulations made in this behalf.
(3) A Committee constituted under this section, shall have such duties, responsibilities and powers as may be prescribed by the Authority and all its recommendations and acts shall be subject to final confirmation by the Authority.
(4) The members of a Committee shall be paid such fees and allowances for attending its meetings and for attending to any other work of the Authority, as may be determined by regulations made in this behalf.
(1) A member or person associated with the Authority or a member of any Committee who—
shall not vote or take part in any proceeding of the Authority or any Committee relating to such matter.
(2) If any member or any person associated with the Authority or any member of a Committee appointed under section 9 has, directly or indirectly, any beneficial interest in any land situated in an area comprised in any housing or development scheme framed under this Act or in an area in which it is proposed to acquire land for any of the purposes of this Act—
31. Owner's obligation when dealing with land as building sites.—If the owner of any land, including a local authority, a body corporate constituted under any law and a department of the Government utilities, sells, leases out or otherwise disposes of such land, he shall lay down and make a street or streets giving access and right of way to the owners of the plots into which the land may be divided, so as to connect them with an existing public or private street, and also provide other amenities.
Comments and case-law
[Section 31 provides for the land owner's obligation when dealing with land as building sites. Uma Shyam Parivar Trust vs. State of Bihar, 1990 (1) PLJ 503.]
32. Lay-out Plan.—(1) Before utilising, selling or otherwise dealing with any land under Section 31, the owner thereof shall apply to the Authority in writing with a lay-out plan of the land showing following particulars, namely :—
Every application under sub-section (1) shall be accompanied by such fee as may be prescribed by r
(1) If any person lays out or makes any street referred to in Section 32, without or otherwise than in conformity with the orders of the Authority, the Vice Chairman may whether or not the offender be prosecuted under this Act, by notice—
(2) If any person on whom such notice is served fails to show cause to the satisfaction of the Vice-Chairman why such street should not be so altered or demolished, the Vice-Chairman may pass an order directing t
All permissions, orders, decisions, notices and other documents of the authority shall be authenticated by the signature of the Secretary to the Authority or any other officer authorised by the Authority in this behalf.
कोई भी व्यक्ति बिना उपाध्यक्ष या प्राधिकार द्वारा प्राधिकृत किसी पदाधिकारी की लिखित अनुमति के बिना वर्णित शर्तों के विपरीत प्राधिकार क्षेत्र में किसी सड़क, फुटपाथ, आमगमन के अन्य भागों, नाला या सुली-पूर्ण नाले, सार्वजनिक उपयोग, के किसी अन्य स्थान पर कोई स्टाल, झोपड़ी, गुमटी, क्लूसी, बैंच, बक्सा, नाव, छत्ता, पशु, सीढ़ी, साइन बोर्ड या अन्य कोई चीज नहीं रखेगा और उपाध्यक्ष ऐसे किसी अन्य कार्रवाई को अतिरिक्त जो इस अधिनियम या अन्य किसी कानून या नियम के अधीन की जा सकती है, बिना पूर्ति सूचना दिये किसी स्थल से विदूषण और बाधाओं को हटाने का आदेश दे सकेगा और किसी पुलिस पदाधिकारी से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस अवहेलना में यथा वर्णित अवधि के भीतर ऐसे विदूषण या बाधा को हटा दे और वह पुलिस अधिकारी तदनुसार उस अवहेलना का अनुपालन करेंगे।
Comments and case-law
[Vice-Chairman of Development Authority has power to get the encroachment removed even without any prior notice and permit the taking of help of police for the purpose. Where eviction notice was issued following passing of order of evi
(1) यह अधिनियम बिहार क्षेत्रीय विकास प्राधिकर अधिनियम, 1981 कहा जा सकेगा।
(2) यह उस तारीख को और ऐसे क्षेत्र में प्रवृत्त होगा, जिसे राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करेगी।
जबतक सन्दर्भ द्वारा अन्यथा अपेक्षित न हो, इस अधिनियम में -
(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रारम्भ के बाद किसी भी समय शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ ‘संबद्ध क्षेत्र’ के नाम से क्षेत्रीय विकास प्राधिकार’ गठित करेगी।
(2) प्राधिकार पूर्ववत नाम से एक निगम निकाय होगा तथा उसे शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुहर होगी। साथ ही, उसे स्थावर और जंगम, दोनों ही प्रकार का सम्पत्ति अर्जित करने, धारित करने और उसका निपटाव करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी और वह उक्त नाम से वाद चलाएगा तथा उस पर वाद चलाया जायेगा।
(3) प्राधिकार में निम्नलिखित सदस्य रहेंगे :-
(1) कोई भी व्यक्ति प्राधिकार के सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने या उसका सदस्य बनने के लिए अर्हित होगा, यदि वह -
(2) कोई व्यक्ति केवल इस कारण कम्पनी का शेयरधारी होने के कारण उप-धारा (1) के खंड (ग) के अधीन अनर्हित हो नहीं होगा या
(1) सरकार अधिसूचना द्वारा किसी सदस्य को पद से अपसारित कर सकेगी, यदि वह-
( ख ) सरकार को यह राय में सदस्य करने के लिये शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो जाय
परन्तु जब सरकार उप-धारा (1) के अधीन कार्यवाही करने की प्रस्थापना करे, तो सम्बद्ध सदस्य को स्पष्टीकरण देने का अवसर प्रदान किया जायेगा और स्पष्टीकरण पर विचार किये बिना तथा ऐसी कार्यवाही के समय में कारण अभिलिखित किये बिना ऐसी कोई भी कार्यवाही नहीं की जायेगी।
(2) पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन अपसारित कोई सदस्य पुनः निर्वाचन या पुनः नाम-निर्देशन का पात्र नहीं होगा।
(1) प्राधिकर में एक सचिव, राज्य सरकार द्वारा नियुक्त होगा या विनियमों द्वारा विहित अथवा प्राधिकर या अध्यक्ष द्वारा प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग और कर्त्तव्यों का पालन करेगा।
(2) प्राधिकर राज्य सरकार द्वारा यथानुगुमोदित विनियमावली द्वारा विहित नियमों और निबन्धों के अध्यक्ष (आर्थिक योजनाकार, परिवहन योजनाकार, स्वास्थ्य और शिक्षा योजनाकार, आकड़ें, सूचना और पद्धति योजनाकार, जैसे तकनीकी कार्य विशेषज्ञ सहित) उतने अन्य पदाधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो उसके कृत्यों के दक्षतापूर्ण सम्पादन के लिये आवश्यक हो, तथा उसके पदनाम और श्रेणी अवधारित कर सकेगा।
(3) प्राधिकर का सचिव, अन्य पदाधिकारी तथा कर्मचारी प्राधिकर की नियुक्तियों से वेतन और भत्ते पाने के हकदार होंगे और ऐसी सेवा शर्तों से शासित होंगे, जो विनियमों द्वारा अवधारित हो।
परन्तु, 500 रु से अधूत वेतनवाले पदों पर बिहार लोक-सेवा आयोग की सलाह से नियुक्ति की जायगी। प्राधिकर 500 रु से ऊपर वेतनवाले किसी पद पर राज्य सरकार के अनुमोदन से नियुक्त कर सकेगी। ऐसी नियुक्ति की कुल अवधि किसी भी दशा में छः महीने से अ
(1) प्राधिकर की बैठक हर एक कैलण्डर वर्ष में कम-से-कम 6 बार होगी और दो क्रमवर्ती बैठकों के बीच साठ दिनों से अधिक का अन्तर नहीं रहेगा।
(2) बैठक का संचालन, कोरम पूर्ति, नोटिस के तामीली कार्य सूची आदि बाबी होगी जो विनियमों में विहित हो।
(1) राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ, सीमा परिभाषि करते हुए (i) क्षेत्र तथा (ii) विकास क्षेत्र नामक क्षेत्रों को स्थापना कर सकेगी जिनके लिये प्राधिकर क्रमशः क्षेत्रीय योजना और अधियोजना तैयार करेगा तथा वहाँ विकास-कार्य का निष्पादन कर सकेगा।
परन्तु कोई भी सैनिक छावनी या उसका कोई भाग अथवा सैनिक या प्रतिरक्षा प्रयोजनों के लिये अपेक्षित कोई भी क्षेत्र, केन्द्रीय सरकार की मंजूरी बिना, ऐसे क्षेत्रों में शामिल नहीं किया जाएगा।
(2) राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, क्षेत्र और विकास क्षेत्र की सीमाओं परिवर्तित कर सकेगी, ताकि अधिसूचना में यथाविनिर्दिष्ट क्षेत्र उससे शामिल या उससे अलग किया जा सके।
(3) इस धारा के अधीन यथास्थापित क्षेत्र और विकास क्षेत्र की सीमाओं का खोतक नक्शा प्राधिकर, सहायता और सम्बद्ध स्थानीय प्राधिकरों के कार्यालयों में निरीक्षण के लिये उपलब्ध रहेगा।
(4) यदि विकेन्द्रीकरण और कार्य की सफलता के प्रयोजनार्थ राज्य सरकार खोई नया
परन्तु इस अध्याय में विनिर्दिष्ट रूप से यथा उपबंधित के सिवा, इसमें अन्तर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं होगा कि इससे प्राधिकर को तत्समय प्रवृत्त किसी विधि को अवहेलना करने के लिये प्राधिकृत किया गया है।
(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन, प्राधिकर विकास क्षेत्र या उसके भाग से सम्बन्धित सभी योजनायें और निर्माण, के निर्धारण, समन्वय और निष्पादन के पर्यवेक्षण के लिये तथा अधिक विनिर्दिष्ट रूप से निम्नलिखित के उत्तरदायी होगा :-
(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होने पर भी प्राधिकर किसी विकास परियोजना के कार्यान्वयन के सम्बन्ध में किसी ऐसे प्राधिकर का, जिसे धारा 12 के अधीन किसी धन का शुगतान किया गया हो, ऐसे निर्देश दे सकेगा, जो वह वांछित समझे।
(2) प्राधिकर धारा 12 की उप-धारा (1) में निर्दिष्ट पर्यवेक्षण की शक्तियों का इस तरह प्रयोग करेगा, जो यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हो कि हर विकास परियोजना, क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के हित में और अनुमोदित नक्शे के अनुसार, निष्पादित की जाती है।
(1) यदि प्राधिकर का समाधान हो जाये कि किसी विकास परियोजना के सम्बन्ध में धारा 13 की उप-धारा (1) के अधीन उसके द्वारा दिये गये निर्देश का उससे विनिर्दिष्ट स्थानीय प्राधिकर, निगम, निकाय एवं अन्य एजेन्सी द्वारा पालन नहीं किया गया है अथवा ऐसा स्थानीय प्राधिकर, निगम निकाय या सरकारी विभाग क्षेत्र के किसी भाग के विकास के लिये अपने हाथ में ली गई किसी स्कीम को पूर्णतः कार्यान्वित करने में असमर्थ है, प्राधिकर किसी निर्माण को स्वयं अपने हाथ में ले सकेगा और यथाशक्ति, ऐसी विकास परियोजना के निष्पादन के लिये या ऐसी स्कीम के कार्यान्वयन के लिये व्यय कर सकेगा तथा स्थानीय प्राधिकर, निगम निकाय एवं एजेंसी से उसका खर्च वसूल सकेगा।
(2) प्राधिकर राज्य-सरकार द्वारा यथानिर्देशित कोई निर्माण भी अपने जिम्मे ले सकेगा और ऐसा खर्च कर सकेगा जो उस कार्य के निष्पादन के लिये आवश्यक हो।
(3) यदि प्राधिकर उप-धारा (1) के अधीन कोई कार्य अपने जिम्मे ले तो, ऐसे कार्य के निष्पादन के प्रयोजनार्थ वह ऐसी सभी शक्तियों रखने वाला समझा जायेगा, जिनका धारा 13 की उप-धारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकर द्वारा तत्समय प्रवृत्त
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होने पर भी, धारा 12 की उप-धारा (1) में उल्लिखित स्कीमों में निम्नलिखित किसी या सभी बातों की व्यवस्था की जा सकेगी :-
प्राधिकर यथाशीघ्र क्षेत्रीय सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक सर्वेक्षण करेगा और क्षेत्रीय योजना तैयार करेगा जिसमें यह वृहद् स्तरों में उपदर्शित होगा कि क्षेत्र की भूमि का किस रीति से उपयोग किया जायेगा, तथा पर विकास-कार्य नियोजित करने या अन्यथा ऐसा कोई विकास-कार्य कितने प्रकारों में कार्यान्वित किया जायेगा, संचार और परिवहन का जाल, नैसर्गिक स्रोतों के संरक्षण और विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण आवास-व्यवस्था आदि के लिये बुनियादी अवस्थापना के विकास के लिये प्रस्ताव, और ऐसे अन्य विषय जिनसे क्षेत्र के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता हो, तथा विशेषकर ऐसी किसी योजना में, निम्नलिखित एक से अधिक या जो विषयों के लिये उपबन्ध किया जा सकेगा :
(1) क्षेत्रीय योजना की तैयारी के साथ-साथ उसके बाद यथाशीघ्र प्राधिकर, विकास क्षेत्र का नागरिक सर्वेक्षण करेगा और भूमि खांचे के भीतर एक अधियोजना का प्रारूप तैयार करेगा।
(2) इस अधियोजना के प्रारूप के पहले, बिहार टाउन प्लानिंग एण्ड इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट एक्ट 1951 (बिहार अधिनियम 5, 1951) के उपबंधों के अधीन राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित और अधिसूचित की जा चुकी पूर्ण या आंशिक क्षेत्र की अधियोजना तब तक के लिये इस अधिनियम के सुसंगत उपबंधों के अधीन प्राधिकर द्वारा तैयार और राज्य सरकार द्वारा मंजूर की गयी समझी जायगी जब तक प्राधिकर अधियोजना को उपान्तरित न कर दे, या नयी अधियोजना तैयार न कर ले।
(3) अधियोजना प्रारूप में -
अधियोजना प्रारूप में सामान्यतः वह रीति उपदर्शित रहेगी, जिस रीति से विकास क्षेत्र के अन्तर्गत भूमि का प्रयोग विनियमित किया जायेगा तथा उसमें वह रीति भी उपदर्शित रहेगी, जिस रीति से उस विकास क्षेत्र में भूमि का विकास कार्यान्वित किया जायेगा। विशिष्टतः इसमें निम्नलिखित में से सभी या किन्हीं बातों के लिये, जब तक आवश्यक हो, उपबंध रहेगा :-
(1) अधियोजना के बाद यथाशीघ्र प्राधिकार ऐसे हर संश्लेष के लिये जिसमें कि विकास क्षेत्र विभाजित किया जा सकता है, एक संक्रीय विकास योजना तैयार करने की कार्यवाही करेगा ।
(2) संक्रीय विकास योजना में –
(1) इस अध्याय में "योजना" शब्द में क्षेत्रीय योजना अधियोजना और संक्रीय विकास योजना सम्मिलित हैं ।
(2) प्राधिकार हर योजना, इसकी तैयारी के बाद यथाशीघ्र अनुमोदनार्थ राज्य सरकार के उपस्थापित करेगा । राज्य सरकार या तो बिना किसी उपान्तरण के या उन उपान्तरणों सहित, जो वह आवश्यक समझे, योजना को अनुमोदित कर सकेगी या प्राधिकार को यह निर्देश देते हुए कि वह निर्दिष्ट सामग्री के पर्यवेक्षण तैयार करे या योजना अनुमोदित करने से इन्कार कर देगी ।
(1) कोई योजना अंतिम रूप से तैयार करने और अनुमोदनार्थ राज्य सरकार को उपस्थापित करने के पूर्व प्राधिकार योजना का एक प्रारूप तैयार करेगा और उसकी एक प्रति तैयारी के लिये उपलब्ध कराकर लोक निर्मित बनाये गये नियमों द्वारा यथाविधि फारम में और रीति से एक नोटिस प्रकाशित करेगा और नोटिस में यथाविधिनिर्दिष्ट तारीख से पहले जो नोटिस प्रकाशन की तिथि से चार महीने के पहले की तारीख न होगी, योजना प्रारूप के बारे में किसी भी व्यक्ति आपत्ति अथवा सुझाव आमंत्रित करेगा ।
(2) प्राधिकार संबद्ध पक्षकारों को सुनवाई का पूरा अवसर देने और सुझावों, आपत्तियों तथा अभ्यावेदनों पर विचार करने के बाद, यदि आवश्यक हो तो, योजना प्रारूप को उपान्तरित करेगा और उसे राज्य सरकार के समक्ष अनुमोदनार्थ उपस्थापित कर देगा ।
राज्य सरकार द्वारा योजना अनुमोदित किये जाने के तुरन्त बाद राज्य सरकार नियमावली द्वारा यथाविधि रीति से नोटिस प्रकाशित करेगी जिसमें यह बताया रहेगा कि योजना अनुमोदित हो गई है और एक ऐसे स्थान का नाम दिया रहे जहाँ योजना को एक प्रति का शीघ्र युक्तियुक्त समय में निरीक्षण किया जा सकता है, साथ ही राज्य सरकार उसमें एक तारीख भी विनिर्दिष्ट करेगी (जो ऐसी नोटिस के प्रकाशन की तारीख से दिन से पहले की न होगी) जिस तारीख को योजना प्रवर्तित होगी ।
(1) वह व्यक्ति योजना प्रारूप का प्रकाशन होने पर या उसके बाद, किसी कृषित परियोजना से संबंधित योजना द्वारा आच्छादित किसी भूमि के उपयोग में कोई परिवर्तन या स्थापना नहीं करेगा या प्राधिकार
(1) यदि योजना के प्रवर्तन के आने के बाद किसी समय राज्य सरकार या प्राधिकार की राय में योजना का उपान्तरण आवश्यक हो; तो राज्य सरकार प्राधिकार को राय से योजना का उपान्तरण कर सकेगी, लेकिन ऐसा करने में इस अध्याय के पूर्वापगामी उपबंध, जहाँ तक वे लागू किये जा सकते हों वहाँ तक, योजना के उपान्तरण पर उसी तरह लागू होंगे जिस तरह योजना की तैयारी, प्रकाशन और अनुमोदन के संबंध में लागू होते हैं ।
(2) अधिक-से-अधिक पाँच वर्षों के अंतराल पर योजना का पूर्णत: पुनर्विलोकन और महत्वपूर्ण नीति विषयक बातों का वार्षिक पुनर्विलोकन किया जायेगा ।
किसी अधियोजना या संक्रीय विकास योजना को अंतिम रूप दिये जाने के तुरन्त बाद प्राधिकार विनियमों द्वारा विहित रीति से उसे प्रकाशित करेगा जिसमें प्रवर्तन की तारीख दी रहेगी ।
(1) यदि राज्य सरकार को राय में कोई भूमि इस अध्याय के अधीन प्राधिकार के कृत्य पालन के लिये अपेक्षित हो, तो 'लोक प्रयोजन' के लिये अपेक्षित माना जायेगा और राज्य सरकार तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार प्राधिकार के लिये ऐसी भूमि अर्जित कर सकेगी ।
(2) किसी भी ऐसी भूमि को जो राज्य सरकार की हो या प्राधिकार के लिये राज्य सरकार द्वारा अर्जित की गई हो, राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना के जरिये प्राधिकार को सौंप सकेगी ।
प्राधिकार की भूमि का निपटाव, जहाँ तक पर विकास कार्यान्वित हुआ हो या नहीं, इसके प्रयोजनार्थ बनाये गये विनियमों के अनुसार प्राधिकार द्वारा किया जायगा ।
प्राधिकार, खरीद, विनिमय, दान, पट्टा और बंधक द्वारा यथाविधि के अधीन अनुज्ञेय किसी अन्य पद्धति में स्थावर या जंगम संपत्ति का अर्जन कर सकेगा ।
(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (अधिनियम 1, 1894) के अधीन अनिवार्य अर्जन द्वारा भूमि अर्जन कर सकेगी;
परन्तु जहाँ पटना के किसी क्षेत्रीय विकास प्राधिकार क्षेत्र में अवस्थित किसी भूमि को अधियोजना या संक्रीय विकास योजना द्वारा, खुली या अनिर्मित स्थान के रूप में रखने की अपेक्षा की गई हो उसे ऐसी अधियोजना/संक्रीय योजना में अनिवार्य अर्जन के अधीन अभिहित लिखा गया हो वहाँ, यदि संबद्ध संक्रीय योजना के प्रवर्तन की तारीख से दस वर्ष बीत जाने पर अथवा जहाँ भूमि भूमि ऐसी अधियोजना और संक्रीय योजना के किसी संशोधन द्वारा अपेक्षित या अभिहित हो वहाँ ऐसे संशोधन के प्रवर्तन की तारीख से यह भूमि अनिवार्य रूप से अर्जित नहीं की जाये तो भूमि का स्वामी, इस प्रकार अर्जित की जानेवाली भूमि में अपने हित की अपेक्षा करते हुए राज्य सरकार पर सूचना तामील कर सकेगा :
(2) यदि राज्य सरकार सूचना पाने की तारीख से 6 (छ:) महीने तक अधिग्रहण अधिनियम 1894 ....
इस अधिनियम के उपबंध उन इलाकों और क्षेत्र में लागू होंगे जो सम
(1) यदि किसी प्राईवेट बाजार-सड़क या बाजार-सड़क के किसी भाग में संतुलन, खड़ंजा लगाना (पेविंग), रोड़ ढलाई (मेटलिंग) पत्थर जोड़ाई (पेविंग), प्रणाल (चैनलिंग), मल-प्रणाल (सर्विंग), जल-निष्कासन (ड्रेनेज), मलबहाव (कचरा?) (सुरक्षित) या प्रकाश की व्यवस्था उपाध्यक्ष के समाधान के अनुसार न की जाए तो, वह बाजार-सड़क या उसके भाग के स्वामियों को तथा ऐसी बाजार-सड़क या उसके किसी भाग की अग्रस्थ या संश्लिष्ट भूमियों और भवनों के स्वामियों को नोटिस देकर उनसे ऐसा कोई निर्माण उसकी राय में आवश्यक हो और ऐसे समय के भीतर जो नोटिस में विनिर्दिष्ट हो, करने की अपेक्षा कर सकेगा।
(2) यदि ऐसा निर्माण नोटिस में विनिर्दिष्ट समय के भीतर निष्पादित न किया जाय, तो उपाध्यक्ष यदि उचित समझे तो, स्वयं निष्पादित करायेगा और उप-धारा (1) में निर्दिष्ट व्यवस्थाओं से संबंधित मद में हुए खर्च के इस अधिनियम के अधीन वसूला कर देने में उत्पन्नात्मक रूप में उस अनुपात में वसूल सकेगा जो उपाध्यक्ष अवधारित करे।
कोई भी व्यक्ति उपाध्यक्ष की पूर्व मंजूरी के बिना और इस अध्याय के उपबंधों तथा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन किसी भवन का परिर्माण या भवन परिवर्तन का आरंभ करेगा, भवन में परिवर्तन/परिवर्धन करेगा, अन्यथा नहीं।
परन्तु प्राधिकार विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों के लिए पृथक् विनियमावली बनायेगा।
(1) किसी स्थानीय प्राधिकार, विधि के अधीन निर्मित किसी निकाय और किसी विभाग के सहित हरके व्यक्ति जो-
परन्तु ऐसी मंजूरी लेने की कोई जरूरत न होगी, यदि परिवर्तन स्थानधर, रसोई-घर, जल-निकासी व्यवस्थाओं को प्रभावित किए बिना भवन के अंदर किया जाए और प्रस्तावित आंतरिक परिवर्तन से तत्समय प्रचलित भवन-विनियमों या योजना-मानकों के उपबंधों का उल्लंघन न हो।
(2) ऐसी हरके नोटिस के साथ ऐसे दस्तावेज और नक्शे दिए जाएंगे, जो विहित किए जाएं।
(3) उप-धारा (1) के अधीन हरके आवेदन के साथ ऐसी फीस दी जाएगी जो इस अधिनियम के बनाए गए विनियमों द्वारा विहित है।
परन्तु रेलवे, केन्द्रीय सरकार के पर्यटन एवं उड्डयन, विभागों तथा बिहार राज्य सरकार के परिचालन सम्बद्ध विभागों के अधी
(1) उपाध्यक्ष किसी भवन के परिर्माण या उसमें परिवर्तन-परिवर्धन की मंजूरी देने का दायित्व तब तक न रहेगा जब तक कि ऐसे भवन परिर्माण या परिवर्तन-परिवर्धन से इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए विनियमों के उपबंधों का उल्लंघन न हो।
(2) यदि प्रस्तावित परिर्माण या परिवर्तन-परिवर्धन से इस अध्याय में इस अध्याय के अधीन बनाए गए विनियमों के उपबंधों का उल्लंघन होता हो, तो नक्शे की मंजूरी अस्वीकृत कर दी जाएगी।
(3) उपाध्यक्ष अपनी मंजूरी उस व्यक्ति को संसूचित करेगा जिसने नोटिस दी हो, और जहाँ वह मंजूरी देने से इनकार करे वहाँ ऐसी नामंजूरी के कारणों का एक संक्षिप्त विवरण अभिलिखित करेगा तथा उस व्यक्ति को कारण सहित नामंजूरी संसूचित करेगा जिसने नोटिस दी हो।
(4) उपर्युक्त मंजूरी या नामंजूरी रसीद से संसूचित की जायेगी जो इसके निर्णित बनें विनियमों में विनिर्दिष्ट हो।
(5) यदि धारा 36 के अधीन उपाध्यक्ष के पास आवेदन किए जाने की तीन माहों की अवधि बीत जाने के बाद उपाध्यक्ष इस पर कोई आदेश न दे और इस संबंध में उपाध्यक्ष द्वारा दिए गए आदेश की कोई नोटिस आवेदक को नहीं दी जाय, तो आवेदक रजिस्ट्री
यदि कोई भवन परिर्मित करने या उसमें कोई परिवर्तन-परिवर्धन न करने की मंजूरी दी जाने के बाद किसी भी समय यह विदित हो जाय कि ऐसी मंजूरी धारा 37 के अधीन दी गई नोटिस या प्रस्तुत जानकारी में किसी सारवान तथ्यपूर्ण विवरण या कपटपूर्ण कथन के फलस्वरूप दी गई थी, तो यह लिखित आदेश द्वारा और अधिलिखित ... परन्तु ऐसा कोई आदेश देने के पहले उपाध्यक्ष प्रभावित व्यक्ति को इस बात की सुनवाई के लिए युक्तियुक्त अवसर देगा कि ऐसा आदेश क्यों न दिया जाए।
(1) जहाँ धारा 37 में निर्दिष्ट मंजूरी के बिना या प्रतिकूल अथवा ऐसी मंजूरी जिस शर्त पर दी गई हो उसका उल्लंघन करते हुए अथवा इस अधिनियम या इसके अधीन बने विनियमों के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन करते हुए किसी भवन का अथवा उसमें कोई परिवर्तन या परिवर्धन आरंभ किया गया हो या किया जा रहा हो (किन्तु पूरा न हो सका हो) उपाध्यक्ष ऐसा किसी भी अन्य कार्रवाई के अंतिरिक्त, जो इस अध्याय के अधीन की जा सकती है, आदेश द्वारा उस व्यक्ति से जिसकी प्रेरणा से उक्त भवन का निर्माण कार्य आरंभ किया गया हो या किया जा रहा हो अपेक्षा कर सकता है कि उसे तुरंत रोक दिया जाए।
(2) यदि ऐसे आदेश का तुरंत अनुपालन न किया जाता हो, तो उपाध्यक्ष किसी पुलिस पदाधिकारी से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस अपेक्षा में यथानिर्दिष्ट अवधि के भीतर उस परिसर से उस व्यक्ति को तथा उसके सहायकों और कामगारों को हटा दे, तथा वह पुलिस पदाधिकारी तदनुसार उस अपेक्षा का अनुपालन करेगा।
(3) उप-धारा (2) के अधीन अपेक्षा का अनुपालन हो जाने के बाद, उपाध्यक्ष यदि उचित समझे तो लिखित आदेश द्वारा किसी पुलिस पदाधिकारी को या प्राधिकार के किसी पदाधिकारी या
(1) उपाध्यक्ष किसी भवन के परिर्माण अथवा उसमें परिवर्तन या परिवर्धन के दौरान तिसरी किसी समय, अथवा इसके प्रयोजनार्थ को विनियम के अधीन यथापेक्षित प्रमाण-पत्र के उपस्थापन के बाद 6 (छ:) मास के भीतर किसी भी समय लिखित नोटिस द्वारा ऐसे कोई बात विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिसके संबंध में ऐसा परिर्माण या निर्माण धारा 37 में निर्दिष्ट मंजूरी के बिना या प्रतिकूल अथवा ऐसी मंजूरी की किसी शर्त के अथवा इस अधिनियम या इसके अधीन बने विनियमों के किन्हीं उपबंधों के उल्लंघन में न हो, और उस व्यक्ति से, जिसने धारा 36 के अधीन नोटिस दी हो या को भवन के परिर्माण का स्वामी हो, अपेक्षा कर सकेगा कि वह-
(2) यदि वह व्यक्ति या स्वामी पूर्वोक्त रीति से हेतुक दर्शित न करे तो वह नोटिस में विनिर्दिष्ट परिवर्तन करने के लिए आबद्ध होगा।
(3) यदि वह व्यक्ति या स्वामी पूर्वोक
किसी संख्या में कोई विकास योजना लागू होने के बाद, कोई भी व्यक्ति उस संश्लिष्ट में स्थित किसी भूमि या भवन का उपयोग उस योजना के अनुरूप ही करेगा या करने देगा अन्यथा नहीं।
परन्तु इस निमित्त बने विनियमों द्वारा यथाविहित शर्तों और निर्बंधों पर किसी भूमि या भवन का उपयोग उस प्रयोजन में और उस हद तक जारी रखने विधि-संगत होगा जिस प्रयोजन में और जिस हद तक उसका उपयोग उक्त योजना के लागू होने की तारीख को होता रहा है।
यदि कोई ऐसा भवन जिसके निर्माण की अनुज्ञा इस अधिनियम के आरंभ से पहले निर्गत की जा चुकी हो, ऐसी अनुज्ञा की तारीख से तीन वर्षों की अवधि के भीतर सर्वथा पूरा न हुआ हो तो, वह अनुज्ञा व्ययगत समझी जाएगी और नई अनुज्ञा आवश्यक होगी।
एक बार दी गई मंजूरी तीन वर्षों तक मान्य रहेगी, जिसके भीतर रजिस्ट्रीकृत वास्तुकार/अभियंता से या उपाध्यक्ष द्वारा अनुमोदित किसी व्यक्ति से भवन विनियमों में विहित प्रारूप में एक पूर्ति प्रमाण-पत्र लेकर उपस्थापित करना होगा और यदि ऐसा न किया जाए, तो उक्त अवधि के बीतने के पहले ही फीस का भुगतान करके अनुज्ञा का पुनर्नवीनीकरण करा लेना होगा। उपाध्यक्ष द्वारा पुनर्मान्य की एक माह की अवधि में दी जायगी। पुनर्मान्यित तत्समय नियमों और विनियमों के अध्यधीन होगा।
(1) प्राधिकार की अपनी निधि होगी और वह उसे अनुरक्षित करेगा, जिसमें निम्नलिखित आकलित किये जायेंगे :-
परन्तु प्राधिकार को स्थापना में केन्द्रीय सरकार अनुदान, ऋण, अग्रिम या अन्य रूप में अंतरिक्त रकम देने के लिये वचनबद्ध नहीं होगी।
(2) प्राधिकार स्थावर सम्पत्ति के कतिपय अंतरणों पर इस धारा में आगे अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार शुल्क प्राप्त करेगा :-
प्राधिकार (राज्य और केंद्रीय सरकार से भिन्न) ऐसे शर्तों तथा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो राज्य सरकार अनुमोदित करे ऋण ले सकेगा।
(१) प्राधिकार धारा 69 के अधीन उधार लिए गए ऋण की अदायगी के लिये एक निक्षेप-निधि रखेगा और उस निधि में प्रतिवर्ष ऐसी राशि डालता जाएगा जो इस प्रकार उधार लिये गए सभी ऋणों की नियत अवधि के भीतर अदायगी के लिए पर्याप्त हो।
(२) निक्षेप-निधि या उसका कोई अंश ऐसे ऋण की पूर्ति के लिये, जो भारत सरकार द्वारा प्रत्याभूत हो, प्रयोजनार्थ बन्ध सृजित की गई हो और जब तक उसका ऋण की पूर्ति के लिये प्रयोग न किया जाए, तब तक उसका उपयोग किसी अन्य प्रयोजन में नहीं किया जाएगा।
प्राधिकार प्रतिवर्ष नियमों द्वारा विहित रूप में और समय पर, तैयार आगामी वित्त-वर्ष के सम्बन्ध में एक बजट तैयार करेगा जिसमें प्राधिकार की प्राक्कलित आय और व्यय दर्शाये जायेंगे तथा राज्य सरकार को उसकी प्रतियाँ अग्रसारित करेगा, जो नियमों द्वारा विहित की जाए।
(१) प्राधिकार के लेखाओं का लेखा-परीक्षा ऐसे व्यक्ति से कराया जाएगा, जिसे राज्य सरकार नियुक्त करेगी।
(२) लेखा-परीक्षा का पारिश्रमिक राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाएगा।
(३) लेखा-परीक्षक अपनी लेखा-परीक्षा रिपोर्ट प्राधिकार के पास प्रस्तुत करेगा और उसकी एक प्रति राज्य सरकार को अग्रसारित कर देगा।
प्राधिकार प्रतिवर्ष ऐसे विवरण प्रस्तुत करेगा जिसमें उसके कार्य-कलापों की रिपोर्ट ऐसे प्रारूप में तैयार करेगा और ऐसी तारीख तक जो उसके पहले राज्य सरकार के पास प्रस्तुत करेगा जो नियमों द्वारा विहित हो।
प्राधिकार प्राक्कलन अनुमोदित करेगा और टेंडर आमंत्रित करेगा तथा ऐसी सभी संविदाएँ करेगा और उनका पालन करेगा जिन्हें वह इस अधिनियम के किसी प्रयोजन और इसके प्रयोजनार्थ बनाए गए नियमों के अनुसार बनाने के लिए आवश्यक या समीचीन समझे।
यदि इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किसी विकास कार्य के अपहरण के फलस्वरूप कोई क्षति होती है तो उसके लिये प्रतिकर के दावे का अधिक्रमण किया जाएगा।
(१) यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से या किसी अन्य व्यक्ति के किसी निकाय की (जिसके अन्तर्गत स्थानीय, नियंत्रण निकाय या कोई सरकारी विभाग भी है) प्रेरणा से क्षेत्रीय विकास योजना, अधियोजना या संक्षेत्रीय विकास योजना के उल्लंघन में अथवा धारा 53 और 36 में निर्दिष्ट अनुज्ञा, अनुमोदन या मंजूरी के बिना, अथवा किसी ऐसी शर्तों के उल्लंघन में जिनके अध्यधीन ऐसी अनुज्ञा, अनुमोदन या मंजूरी दी गई हो, कोई विकास कार्य अपने हाथ में ले या निष्पादित करे तो वह दस हजार रुपये तक जुर्माने से एवं एक वर्ष की साधारण कैद के भागी होगा और अपराध-कर्म जारी रहने की दशा में, प्रथम अपराध-कर्म में योग-सिद्ध के बाद अपराध-कर्म जारी रहने के दौरान प्रत्येक दिन के लिये पाँच सौ रुपये तक अतिरिक्त जुर्माने से दंडित होगा।
(२) जब कोई व्यक्ति धारा 41 के उपबंधों के उल्लंघन में या उक्त धारा के परन्तुक के अधीन विनियमों द्वारा यथाविहित किन्हीं शर्तों या निबंधनों के उल्लंघन में किसी भूमि या भवन का उपयोग करे तो वह पाँच हजार रुपये तक जुर्माने से और अपराध-कर्म जारी रहने की दशा में प्रथम अपराध-कर्म में योग सिद्ध के बाद अपराध-कर्म जारी र
ऐसी कोई एजेंसी, जिसे विकास क्षेत्र में रहने वालों या अधिष्ठानों में जलापूर्ति या अन्य सेवाओं की व्यवस्था करने का काम सौंपा गया हो, तब तक नवनिर्मित मकानों को जल कनेक्शन नहीं देगी या सेवाओं की व्यवस्था नहीं करेगी अपने पास से प्राप्त किसी कनेक्शन को स्थायी पूर्व व्यवहार के लिए परिवर्तित नहीं करेगी, तब तक ऐसे कनेक्शन के लिये, दिये गए आवेदन के साथ इस प्राधिकार अथवा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन मंजूरी करने के लिये शासक किसी स्थानीय प्राधिकारी से प्राप्त प्रमाण पत्र अनुलग्न नहीं हो।
परन्तु यदि आवेदन के साथ प्राधिकार द्वारा मंजूर नक्शा अनुलग्न हो तो गैर घरेलू व्यवहार के लिये अस्थायी जल कनेक्शन दिया जा सकेगा।
(१) जहाँ कोई विकास या भवन परिनिर्माण क्षेत्रीय योजना, अधियोजना या संक्षेत्रीय विकास योजना के उल्लंघन में अथवा धारा 35, 36 और 37 में निर्दिष्ट अनुज्ञा, अनुमोदन या मंजूरी के बिना अथवा किसी ऐसी शर्तों के उल्लंघन में जिसके अध्यधीन ऐसी अनुज्ञा, अनुमोदन या मंजूरी दी गई हो, आरम्भ किया गया हो या निष्पादित किया जा रहा हो, या पूरा कर लिया गया हो, तो इस निमित्त प्राधिकार द्वारा सम्यक् तथा कोई पदाधिकारी इस अध्यादेश के अधीन संस्थायी किसी अभियोजन के अतिरिक्त, संक्षेप में कारण बताते हुए यह आदेश-निर्देश दे सकेगा कि उसका स्वामी या वह व्यक्ति, जिसकी प्रेरणा से उक्त परिनिर्माण या विकास कार्य आरम्भ किया गया हो या किया जा रहा हो अथवा पूरा किया गया हो उस परिनिर्माण या विकास कार्य को अपस्थापित कर सकेगा या करा सकेगा और उस प्रकार अपस्थापित कराने का खर्च अधिनियम? स्थानीय या उस व्यक्ति से वसूल करेगा।
परन्तु ऐसा कोई आदेश तब तक नहीं दिया जायेगा जब तक स्वामी या सम्बद्ध व्यक्ति को पाँच दिन का अवसर न दे दिया जाए।
(२) उप-धारा (१) के अधीन दिए गए आदेश में विनिर्दिष्ट कोई भी व्यक्ति उस आदेश को प्राधिकृत
(१) यदि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध अपराध-कर्म करने वाला व्यक्ति कोई कम्पनी हो, तो ऐसे हर व्यक्ति को, जो अपराध-कर्म किए जाने के समय कम्पनी के कारबार संचालन के लिये कम्पनी का प्रभारी और उसके प्रति जिम्मेवार हो, वह अपराध-कर्म के दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध तदनुसार कार्यवाही चलायी जा सकेगी तथा उसे दंड दिया जा सकेगा।
परन्तु इस उप-धारा में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यदि वह व्यक्ति यह सिद्ध कर दे कि अपराध कर्म किए जाने से उसे जानकारी नहीं थी या उसने इस प्रकार के अपराध-कर्म को रोकने के लिए सर्वथा तत्परता बरती थी।
(२) उप-धारा (१) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कर्म कम्पनी द्वारा किया गया हो और यह सिद्ध हो जाए कि अपराध-कर्म किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या कम्पनी के किसी अन्य पदाधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से या उसकी ओर से किसी गुनी? अपराध-कर्म के दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध कार्यवाही चलायी जा सकेगी तथा उसे दंडित किया जा सकेगा।
स्पष्टीकरण :- इस धारा के प्रयोजनार्थ -
(क) कम्पनी के अभिप्राय निगम-निकाय,
इस अधिनियम के अधीन अभियोजन के अभाव में वसूल गए सभी जुर्माने प्राधिकार की निधि में डाले जायेंगे।
(१) इस अधिनियम के द्वारा या अधीन दण्डनीय किसी अपराध-कर्म की कार्यवाही चलाने के पहले या बाद में प्राधिकार या वह व्यक्ति जिसे प्राधिकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत करे, प्रशमित कर सकेगा।
(२) जहाँ कोई अपराध-कर्म प्रशमित किया जाए वहाँ अभियोजन न हो, उम्मीदवार? किया जाएगा और प्रशमित अपराध-कर्म के सम्बन्ध में उससे आगे कोई कार्यवाही नहीं चलायी जाएगी।
(१) जब अधियोजना अथवा संक्षेत्रीय क्षेत्रीय विकास योजना के अनुसार विकास कार्य का निष्पादन प्राधिकार द्वारा पूरा हो जाय, तो प्राधिकार लिखित नोटिस द्वारा स्थानीय प्राधिकार से स्कीम के अन्तर्गत समाविष्ट सड़कों, पार्कों, सुख-सुविधाओं का तथा मल, निकास, जल निकास, प्रकाश, स्वच्छता-सफाई व्यवस्था तथा अन्य नगरीय और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं का भार ग्रहण करने के लिए कहेगा और यदि स्थानीय प्राधिकार ऐसी नोटिस तामील होने के एक वर्ष के भीतर इस नोटिस का अनुपालन नहीं करे, तो ऐसी सड़कों आदि तथा प्रणालियों स्थानीय प्राधिकार में निहित समझी जाएँगी और स्थानीय प्राधिकार ऐसी सड़कों और प्रणालियों के अनुरक्षण के लिए जिम्मेदार होगा।
(२) यदि उप-धारा (१) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के सम्बन्ध में प्राधिकार और स्थानीय प्राधिकार के बीच कोई मतभेद उठे तो यह विषय राज्य-सरकार को निर्देशित किया जायगा और उस पर उसका विनिश्चय अन्तिम होगा।
की रिपोर्ट से अथवा अपनी किसी जानकारी के आधार पर जो उसके पास उपलब्ध हो, पर प्राधिकार का समाधान हो जाए कि विकास क्षेत्र से बाहर अधिकृत किसी भूमि में, ऐसी किसी सुख-सुविधा की व्य
(१) जब अधियोजना अथवा संक्षेत्रीय क्षेत्रीय विकास योजना के अन्तर्गत विकास कार्य का निष्पादन प्राधिकार द्वारा पूरा हो जाय, तो प्राधिकार लिखित नोटिस द्वारा स्थानीय प्राधिकार से स्कीम के अन्तर्गत समाविष्ट सड़कों, पार्कों, सुख-सुविधाओं का तथा मल, निकास, जल निकास, प्रकाश, स्वच्छता-सफाई व्यवस्था तथा अन्य नगरीय और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं का भार ग्रहण करने के लिए कहेगा और यदि स्थानीय प्राधिकार ऐसी नोटिस तामील होने के एक वर्ष के भीतर इस नोटिस का अनुपालन नहीं करे, तो ऐसी सड़कों आदि तथा प्रणालियों स्थानीय प्राधिकार में निहित समझी जाएँगी और स्थानीय प्राधिकार ऐसी सड़कों और प्रणालियों के अनुरक्षण के लिए जिम्मेदार होगा।
(२) यदि उप-धारा (१) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के सम्बन्ध में प्राधिकार और स्थानीय प्राधिकार के बीच कोई मतभेद उठे तो यह विषय राज्य-सरकार को निर्देशित किया जायगा और उस पर उसका विनिश्चय अन्तिम होगा।
(१) यदि प्राधिकार को किसी विकास क्षेत्र में प्राधिकार द्वारा निष्पादित किसी विकास-कार्य के फलस्वरूप, उस क्षेत्र में या विकास क्षेत्र के भीतर किसी ऐसे अन्य क्षेत्र में, जो विकास कार्य द्वारा लाभान्वित हुआ है या होने वाला है, किसी सम्पत्ति के मूल्य में वृद्धि हुई है या होने वाली है, तो प्राधिकार सम्पत्ति के स्वामी या उससे हितबद्ध किसी अन्य व्यक्ति पर, विकास के निष्पादन के फलस्वरूप सम्पत्ति के मूल्य में हुई वृद्धि के साथ-साथ राज्य सरकार के अनुमोदन से क्षतिपूर्ति चार्ज लगाने का हकदार होगा।
परन्तु प्राधिकार के द्वारा विकास क्षेत्रों के भीतर सरकार, स्थानीय निकाय या निगमित निकाय द्वारा स्वाधीन भूमि पर कोई कृषि हानि नहीं लगाया जायेगा।
परन्तु यह भी कि जहां सरकार, स्थानीय प्राधिकार या निगमित निकाय को कोई भूमि विकास कार्य के लिये दी गई हो, वहाँ इस धारा के अधीन कोई क्षतिपूर्ति चार्ज नहीं लगाया जायेगा।
(१) किसी विकास क्षेत्र में स्थित किसी सम्पत्ति के सम्बन्ध में, एक-तिहाई के बराबर और किसी अन्य क्षेत्र में स्थित सम्पत्ति के सम्बन्ध में दस प्रतिशत से अनधिक होगा जो विकास स्की
जब प्राधिकार को यह प्रतीत हो कि क्षतिपूर्ति चार्ज की रकम अवधारित करने की दृष्टि से कोई प्रकार विशेष-स्कीम काफी अंग बढ़िया हो तो प्राधिकार उसे निमित्त आदेश द्वारा घोषित कर सकेगा कि क्षतिपूर्ति चार्ज अवधारित करने के प्रयोजनार्थ स्कीम का निष्पादन पूर्ण समझा जायेगा और इसके बाद सम्पत्ति के स्वामी या उसमें हितबद्ध किसी व्यक्ति को लिखित नोटिस देगा कि प्राधिकार धारा 59 के अधीन उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में क्षतिपूर्ति चार्ज की रकम का निर्धारण करना चाहता है।
(२) इसके बाद प्राधिकार सम्बद्ध व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के बाद उस व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत क्षतिपूर्ति चार्ज की रकम का निर्धारण करेगा और ऐसा व्यक्ति, प्राधिकार से ऐसे निर्धारण की लिखित नोटिस पाने के तारीख से तीन महीने के भीतर, लिखित घोषणा द्वारा प्राधिकार को सूचित करेगा कि वह निर्धारण को स्वीकार करता है या उससे सहमत नहीं है।
(३) यदि प्राधिकार द्वारा प्रस्तावित निर्धारण उप-धारा (२) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर सम्बद्ध व्यक्ति स्वीकार कर ले तो, ऐसा निर्धारण अन्तिम होगा।
(४) यदि सम्बद्ध व्यक्ति निर्धारण से सहमत न
(१) धारा 60 की उप-धारा (५) में विनिर्दिष्ट मामले के अवधारण के लिए प्राधिकार इस धारा 89 में यथाविनिर्दिष्ट अपील अधिकरण के पास निर्देशित करेगा।
(२) अधिकरण ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जो इस निमित्त बनाये गए नियमों द्वारा विहित हो।
(१) इस अधिनियम के अधीन उद्भुत क्षतिपूर्ति चार्ज उतनी किस्तों में भुगतान होंगे और ये किस्तें ऐसे समय और इस रीति से भुगतान होंगी जो इनके निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा नियत की जाए।
(२) क्षतिपूर्ति चार्ज का कोई बकाया भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूलनीय होगा।
(१) यदि कोई चार्ज अथवा भूमि, भवन या अन्य स्थावर या जंगम सम्पत्तियों के निपटान के आगम अथवा भाड़ों और लाभों के रूप में इस प्राधिकार का देय कोई भी धन किसी भी स्थिति में, उस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में अधिक्रमित व्यवस्था न की गई हो, प्राधिकार द्वारा भू-राजस्व के रूप में वसूली जायेगा।
(२) यह प्राधिकार बिहार बिल्डिंग (लीज, रेंट एंड इविक्शन) कंट्रोल एक्ट, 1974 (बिहार एक्ट सं० 3, 1974) बिहार मनीलेंडर्स एक्ट, 1938 (बिहार एक्ट सं० 2, 1938) के अधीन वसूली की सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा।
(1) राज्य सरकार प्राधिकार को किसी संकल्प को या प्राधिकार के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या प्राधिकार के किसी पदाधिकारी को किसी आदेश को अपास्त कर सकेगी, यदि राज्य-सरकार को यह सम्मति या आदेश विहित प्रारूप प्रदत्त शक्ति के परे हो ।
(2) राज्य-सरकार प्राधिकार को सामान्य नीति के सम्बन्ध में निर्देश दे सकती है ।
प्राधिकार राज्य सरकार को ऐसी रिपोर्ट, विवरणियां और अन्य जानकारी प्रस्तुत करेगा जो राज्य-सरकार समय-समय पर अपेक्षा करेगी ।
इस अध्यादेश द्वारा या उसके अधीन बनाये गये किसी नियम या विनियम द्वारा अपेक्षित हर एक नोटिस, आदेश या कोई अन्य दस्तावेज प्राधिकार के सचिव द्वारा सामान्य मुहर के साथ हस्ताक्षरित होगी और सम्बद्ध या पक्षकारों पर सत्यक रूप से तामील हुई मानी जायगी बशर्ते तामिल की किसी निम्नलिखित रीति से की जाये :-
परन्तु-
उस पर सचिव के हस्ताक्षर और मुहर रहेगी; इसके अलावे में इसका व्यापक प्रचार नोटिस की प्रतियां छाप कर और दूसरी विधियों द्वारा तथा स्थानीय अंग्रेजी और हिन्दी दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित कर द्वारा जायगा :- इस अधिनियम के अधीन दी गयी हर एक सार्वजनिक नोटिस लिपिबद्ध होगी; उस पर प्राधिकार के सचिव का हस्ताक्षर रहेगा और इसको सामान्य मुहर लगी रहेगी तथा उसके लोगों के सहज दृश्य सार्वजनिक स्थानों पर इसकी प्रतियां चिपकाकर और दूसरी विधियों द्वारा तथा स्थानीय प्रमुख अंग्रेजी और हिन्दी दैनिकों के लगातार तीन अंकों में प्रकाशित कराकर प्रभावित इलाके के लोगों को इससे पूरी तरह अवगत करा दिया जायगा ।
जहां इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम या विनियम के अधीन अन्तर्निहित या दी गई किसी नोटिस, आदेश या अन्य दस्तावेज में कुछ करने का अधिकार है, जिसके लिये इस अधिनियम या नियम या विनियम में कोई समय नियत नहीं हो, वहां नोटिस, आदेश या दस्तावेज में उक्त कार्य करने के लिये अधिकतम
प्राधिकार का हर एक सदस्य और हर एक पदाधिकारी तथा अन्य कर्मचारी भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (सं. 45, 1860) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जायेंगे ।
प्रथम श्रेणी दण्डाधिकारी से निम्न कोटि का कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध कर्म का विचारण नहीं करेगा ।
इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध कर्म के लिये कोई अभियोग प्राधिकार या अध्यक्ष अथवा इस निमित्त प्राधिकार या अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत किसी पदाधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना नहीं चलाया जायगा ।
कोई व्यक्ति के विरुद्ध किसी ऐसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजना या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं चलाई जायेगी, जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम या विनियम के अधीन सद्भावपूर्वक किया गया हो या किये जाने के लिये अभिप्रेत हो ।
प्राधिकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना के द्वारा यह घोषणा कर सकेगा कि विनियम बनाने की शक्ति को छोड़, इस अधिनियम के अर्थों में उसके अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा प्रयुक्त किसी शक्ति का प्रयोग, अधिसूचना में उल्लिखित पदाधिकारी या स्थानीय अधिकारी (या धारा 9 के अधीन गठित समिति) द्वारा भी ऐसे मामलों में और ऐसी शर्तों के अधीन किया जा सकेगा, जो इसमें विनिर्दिष्ट हो ।
(1) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाये गये नियमों और विनियमों के उपबन्ध, किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
(2) किसी ऐसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होने पर भी इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये नियमों तथा विनियमों के उपबन्धों के अनुसार किसी क्षेत्र में कोई विकास-कार्य किसी व्यक्ति या निकाय को केवल इस कारण कि ऐसे विकास के लिये ऐसी अन्य विधि के अधीन अपेक्षित अनुज्ञा, अनुमति या अंजाम प्राप्त नहीं की गई है; विरुद्ध हाथ में लिया गया या किया गया निष्पादित किया गया नहीं समझा जायगा ।
तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होने पर भी, इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के उपबन्धों में असंगत नियम, विनियम या उप-विधि, इस अधिनियम की धारा 1 की उप-धारा (2) के अधीन अधिसूचित क्षेत्र के भीतर नहीं लागू होगी ।
(1) प्राधिकार या इसके किसी सदस्य, किसी पदाधिकारी या अन्य कर्मचारी द्वारा अथवा प्राधिकार या प्राधिकार की किसी समिति, पदाधिकारी या अन्य कर्मचारी के निर्देशों कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम या विनियम के अनुसरण में किये गये या किये जाने के लिये तात्पर्यित किसी कार्य के सम्बन्ध में तब तक कोई वाद नहीं चलाया जायगा, जब तक कि प्राधिकार की दशा में उसके अध्यक्ष को और किसी अन्य दशा में वादनीय व्यक्ति के निवास-स्थान पर एक
(2) उप-धारा (1) में यथावर्णित कोई बात, जब तक कि वह किसी स्थावर सम्पत्ति के प्रत्यर्पण के लिये या उस पर हक की घोषणा के लिये न हो, वाद हेतुक उत्पन्न होने की तारीख से छः महीने बीत समाप्त के बाद नहीं चलाया जायगा ।
(3) उप-धारा (1) में अन्तर्विष्ट कोई बात किसी ऐसे वाद पर लागू नहीं समझी जायगी जिसमें दावाकृत एवं अभिकर्ता कोई ऐसी निष्ठा हो जिसका उद्देश्य नोटिस दिने या वाद चलाना स्थगित रखने से निष्फल हो जाता हो ।
यह अधिनियम उन निर्माणों पर, जो भवन या केवल ध्वंसी भागों को प्रभावित करते हैं और इसके बाहर रूप को तात्कालिक रूप से प्रभावित नहीं करते हैं तथा मलिनों, मल-प्रणाली मौरियों (सेनों) पाइपों, केबुलों आदि की मरम्मत या नवीकरण से सम्बन्धित ऐसे निर्माणों पर, जो स्थानीय प्राधिकार या निगम या सरकार द्वारा निष्पादित किये जायें, लागू नहीं होगा। इस अधिनियम की कोई बात निम्नलिखित के सम्बन्ध में नहीं लागू होगी :-
(1) राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में सूचना के जरिये इस अध्यादेश के प्रयोजनों के कार्यान्वयन के लिये नियम बना सकेगी ।
(2) पूर्ववर्ती शक्ति का व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित किसी भी सभी विषयों का उपबन्ध किया जा सकेगा :-
इस अध्यादेश के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये प्राधिकार इस अधिनियम और इसके अधीन बनाये गये नियमों के संगत विनियम बना सकेगा तथा पूर्ववर्ती शक्ति का व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियमों में निम्नलिखित के लिये उपबन्ध किया जा सकेगा :-
(1) यदि कोई व्यक्ति किसी अधिकार बिना या प्राधिकार की लिखित अनुज्ञा बिना प्राधिकार के किसी भवन या उसके किसी भाग पर उससे सम्बन्धित अपनी अधिपूर्ति को समाप्ति के बाद शीघ्र बनाये रहे, तो वह प्राधिकार को इस भवन का कब्जा सौंपने तक अधिपूर्ति की समाप्ति के ठीक पहले भुगतेय भाटक की दर से तिगुनी दर से नुकसानी का देनदार होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति किसी अधिकार बिना या प्राधिकार की लिखित अनुज्ञा बिना प्राधिकार की खाली भूमि पर, इससे सम्बन्धित अपनी अधिपूर्ति की समाप्ति के बाद शीघ्र कब्जा बनाये रहे, तो वह प्राधिकार की खाली भूमि का कब्जा तक प्रति एक सौ वर्गमीटर भूमि के लिये प्रति दिन 10 रु. की दर से नुकसानी का देनदार होगा ।
यदि कोई व्यक्ति अधिकार बिना या प्राधिकार की लिखित अनुज्ञा बिना प्राधिकार के किसी भूमि या भवन पर कब्जा कर ले, तो वह भूमि की दशा में प्रति एक सौ वर्गमीटर के लिये प्रतिदिन 20 रु. की दर से और भवन की दशा में प्रतिदिन हरक सजिल के प्रति एक वर्गमीटर के लिये प्रतिदिन 30 रु. की दर से नुकसानी का देनदार होगा ।
जहां कोई अभिधारी अधिपूर्ति के निर्बंधों के उल्लंघन में भवन या उसके किसी भाग को उप-किराये पर दे, तो उसकी अधिपूर्ति उप-किराये पर देने की तारीख से समाप्त हो जायगी तथा अधिभारी और उप-अधिभारी दोनों ही संयुक्त रूप में और अलग-अलग प्राधिकार को भवन के कब्जे के लिये भुगतेय कब्जा सौंपने तक अधिपूर्ति समाप्त होने के तुरन्त नुकसानी का देनदार होंगे या किराये की दर से तिगुनी दर से प्राधिकार को नुकसानी के देनदार होंगे ।
(1) भूमि या भवन के प्रत्यर्पण और नुकसानी के बाद में न्यायालय, व्यवहार-प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 20, नियम 12 में विनिहित रीति से प्राधिकार को कब्जा सौंपे तक नुकसानी संगणित करेगा :- जब कभी प्राधिकार का प्राधिकार द्वारा वाद प्राधिकार के कब्जा में आने के लिये कोई वाद चलाया जाये, तो न्यायालय, यथास्थिति, भूमि या भवन के कब्जे प्रत्यर्पण की तारीख तक नुकसानी के लिये दिये गये परितो और नुकसानी व्यवहार-प्रक्रिया-संहिता, 1908 के आदेश 20, नियम 12 में विनिहित रीति से संगणित की जायेगी।
(2) व्यवहार प्रक्रिया संहिता में प्रतिकूल उपबंध होने पर भी प्राधिकार के उपाध्यक्ष तथा प्राधिकार द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य पदाधिकारी खण्ड 82, 83 तथा 84 के अन्तर्गत नुकसानी (डैमेज) लगाने के लिये सक्षम होंगे ।
उपाध्यक्ष एवं प्राधिकार द्वारा प्राधिकृत अन्य पदाधिकारी इन खण्डों के अन्तर्गत कार्य निष्पादन में व्यवहार न्यायालय समझे जायेंगे ।
हैं, जो व्यक्ति प्राधिकार द्वारा वी भूमि या भवन में अनधिकृत रूप से कब्जा किए हुए हो या उसके उपयुक्त कार्य कर रहे हो ।
(ख) भवनों से निष्कासन की कार्रवाई
(1) कोई भी व्यक्ति बिना उपाध्यक्ष या प्राधिकार द्वारा प्राधिकृत किसी पदाधिकारी की लिखित अनुमति के, या अनुमति में वर्णित शर्तों के विपरीत प्राधिकार क्षेत्र में किसी सड़क, फूटपाथ, आवागमन के अन्य मार्ग, नाला या गुमटी, शौचालय, नाली, सार्वजनिक उपयोग, के किसी अन्य स्थान पर कोई स्टाल, झोपड़ी, कुर्सी, बेंच, बक्सा, नाद, खूंटा, पशु-सिंह, साईकिल या अन्य कोई चीज नहीं रखेगा और उपाध्यक्ष ऐसे किसी अन्य कार्रवाई के अतिरिक्त जो इस अधिनियम या अन्य किसी कानून या नियम के अधीन की जा सकती है, बिना पूर्व सूचना दिये किसी स्थल से विदूषण और बाधाओं को हटाने का आदेश दे सकेगा और किसी पुलिस पदाधिकारी से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस अवस्था में यथा विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर ऐसे दोषपूर्ण या अन्य बाधा को हटा दे और वह पुलिस अधिकारी तदनुसार उस अपेक्षा का अनुपालन करेंगे।
बिहार राज्य पर लागू होने में कोर्ट फीस अधिनियम, 1870 (सं0 7, 1870) में अन्तर्विष्ट किसी बात के प्रतिकूल होने पर भी निम्नलिखित वादों और उनके उन्नयन अपीलों के सम्बन्ध में प्राधिकार द्वारा शुक्लत: फीस, चाहे वाद और दावे का मूल्य जो भी हो, पन्द्रह रुपये होगी :-
प्राधिकार द्वारा चलाये गये वादों में न्यायालय अर्थयतरिम (interim) निषेधाज्ञा पारित करेगा और हेतुक दर्शित करने की नोटिस निगत करेगा। जब कभी किसी व्यक्ति को बही आत्यंतिक कर दिया जाय और पक्षकारों की सुनवाई के बाद ऐसा आदेश पारित करेगा जो वांछित समझे तथा उस आदेश पर व्यवहार-प्रक्रिया-संहिता, 1908 के आदेश 39 के सभी उपबंध लागू होंगे।
उपाध्यक्ष, प्राधिकार की ओर से और उसके द्वारा निर्याण के अध्ययन-
(1) अपील अधिकरण में एक अध्यक्ष और दो सदस्य होंगे।
(2) अध्यक्ष राज्य सरकार द्वारा राज्य विधि सेवा के जिला न्यायाधीश संवर्ग से नियुक्त किया जायगा।
(3) राज्य सरकार अधिकरण के सदस्यों के रूप में और दो व्यक्तियों को नियुक्त करेगी जिनमें से एक कम-से-कम अधीक्षण अभियंता की कोटि का सिविल इंजीनियर होगा और दूसरा चार्टर्ड मूल्यांकन या सिविल इंजीनियर होगा जिसे नगर निवेशन तथा सम्पत्तियों के मूल्यांकन का योग्यता और अनुभव प्राप्त हो।
(4) अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्य राज्य सरकार के प्रसाद पद्य पद धारण करेंगे।
(5) अपने अपीली प्राधिकारों के प्रयोग में किए गए अधिकरण के सभी विनिश्चय अन्तिम होंगे और उन पर किसी विधि न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा चाहे वह वाद के रूप में हो या पुनरीक्षण के लिए किसी अन्य कार्यवाही के रूप में।
अधिकरण को तसे निर्देशित किसी विषय का अवधारण करने के प्रयोजनार्थ, निम्नलिखित विषयों से सम्बन्धित किसी वाद का विचारण करते समय, वही शक्तियां होंगी, जो सिविल प्रोसीड्योर कोड, 1908 के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित है :-
इस अध्यादेश में अन्यथा उपबंधित अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के अधीन तात्पर्यित कोई कार्य, किसी शक्ति का प्रयोग या किसी कत्तव्य का पालन करने से रोकने के लिए कोई निषेधाज्ञा नहीं मंजूर करेगा।
(1) यदि राज्य सरकार को समाधान हो जाय कि जिन प्रयोजनों के लिए इस अध्यादेश के अधीन प्राधिकार स्थापित किया गया था वे सारे: पूरे हो चुके हैं और इस प्रकार राज्य सरकार की राय में प्राधिकार की मौजूदगी को बनाये रखना आवश्यक है, तो राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना के जरिये यह घोषित कर सकेगी कि प्राधिकार इस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट तारीख से विघटित कर दिया जायगा और तदनुसार प्राधिकार विघटित हुआ समझा जायगा।
(2) उक्त तारीख से-
(1) प्राधिकार के गठन की तारीख से-
Application for sanction for construction of building filed—No document to show that the notice was actually sent and served on the applicant to rectify defects—No reasons recorded for rejecting the application and such refusal together with reasons not communicated to the petitioner—General notice published in newspaper regarding demolition of buildings constructed without sanction—Vice-Chairman failed to exercise his statutory duty while rejecting the application—There is total non-application of mind by the Vice-Chairman. Held : The Vice-Chairman is required to act strictly in accordance with the provisions of Section 37 of the said Act, regulations and bye-laws for the time being in force in the matter of disposal of applications for grant of sanction. The Vice-Chairman is not supposed to exercise his discretion on the basis of executive instructions unless the provisions, regulations and bye-laws are amended or modified. The Vice-chairman must bear in mind that he is exercisin
Does not create any interest in the property—Such right can be enforced only by filing a regular suit for specific performance of contract. Harjinder Singh Choudhary vs. Ranchi Regional Development Authority, 2005 (2) JCR 200 (Jhr).
Substantiality of—No notice to show cause or opportunity of hearing given before passing the order—violation of mandatory requirement—Order of cancellation of sanction cannot be sustained in law. Harjinder Singh Choudhary vs. Ranchi Regional Development Authority, 2004, 2004(1) JCR 58 (Jhr).
Without giving notice to show cause or opportunity of hearing to the person in whose favour plan was sanctioned—Not proper—Order of cancellation quashed. Harjinder Singh Choudhary vs. Ranchi Regional Development, 2005 (2) JCR 200 (Jhr).
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